उत्तर प्रदेश

24 साल पहले दो माह की मासूम को गोद लिया, आज भी बेटी से बढ़कर दिया प्यार

Kavita2
10 Aug 2026 1:42 PM IST
24 साल पहले दो माह की मासूम को गोद लिया, आज भी बेटी से बढ़कर दिया प्यार
x

लखनऊ। रिश्ते सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं बनते, बल्कि प्यार, भरोसे और अपनापन भी किसी रिश्ते को उतना ही मजबूत बना सकते हैं। पीजीआइ क्षेत्र में सामने आई सुनील कुमार के परिवार की कहानी इसी सोच को सच्चाई में बदलती दिखाई देती है। करीब 24 वर्ष पहले जब सुनील कुमार ने महज दो माह की एक मासूम बच्ची को गोद लिया, तब शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि आने वाले वर्षों में यह बच्ची उनके परिवार का उतना ही अभिन्न हिस्सा बन जाएगी, जितनी उनकी अपनी बेटी।

सुनील और उनकी पत्नी ने गोद ली गई बच्ची और अपनी बेटी के बीच कभी किसी तरह का अंतर नहीं किया। दोनों को एक साथ बड़ा किया गया, साथ पढ़ाया गया और परिवार की हर खुशी में दोनों की बराबर भागीदारी रही। समय के साथ दोनों बच्चियां हमउम्र हुईं और उनके बीच बहनों जैसा रिश्ता मजबूत होता चला गया।

परिवार के लिए यह केवल गोद लेने की कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी परवरिश की मिसाल थी जिसमें रिश्ते की पहचान खून से नहीं, बल्कि स्नेह और विश्वास से तय हुई।

दो माह की बच्ची को बनाया परिवार का हिस्सा

करीब 24 वर्ष पहले सुनील कुमार ने दो माह की एक बच्ची को गोद लिया था। उस समय बच्ची बेहद छोटी थी और उसे परिवार की जरूरत थी। सुनील और उनकी पत्नी ने उसे अपनाने का फैसला किया और उसे अपनी बेटी की तरह पालने की जिम्मेदारी उठाई।

बच्ची के परिवार में आने के बाद उसकी परवरिश में किसी तरह का भेदभाव नहीं किया गया। घर में पहले से मौजूद बेटी और गोद ली गई बच्ची दोनों को समान अवसर मिले। माता-पिता ने शिक्षा से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों और पारिवारिक जिम्मेदारियों तक हर स्तर पर दोनों के साथ बराबरी का व्यवहार किया।

बचपन से ही दोनों साथ रहीं। एक-दूसरे के साथ खेलना, पढ़ाई करना और परिवार की खुशियों में शामिल होना उनके जीवन का हिस्सा बन गया।

अपनी बेटी भी महसूस नहीं करती थी फर्क

सुनील कुमार की अपनी बेटी ने भी कभी अपनी बहन को परिवार से अलग नहीं माना। दोनों के बीच ऐसा रिश्ता बना कि गोद ली गई बेटी के परिवार में आने की कहानी उनके रिश्ते के बीच दीवार नहीं बन सकी।

परिवार के माहौल और माता-पिता के व्यवहार ने दोनों के बीच बराबरी की भावना को मजबूत किया। सुनील की अपनी बेटी कई बार मजाक में उनसे कहती थी, “पापा, आप तो उन्हें मुझसे ज्यादा प्यार करते हैं।”

बेटी की यह बात परिवार के रिश्ते की गहराई को बयां करती है। इसमें शिकायत से ज्यादा अपनापन और बहन के प्रति स्वीकार्यता झलकती थी। यह भी दिखाता है कि माता-पिता ने दोनों बच्चों को समान प्यार देने की कोशिश की और दोनों बेटियों ने उस रिश्ते को सहजता से स्वीकार किया।

शिक्षा और परवरिश में नहीं किया भेद

सुनील कुमार और उनकी पत्नी ने दोनों बेटियों की पढ़ाई-लिखाई पर बराबर ध्यान दिया। दोनों को समान अवसर देने की कोशिश की गई, ताकि किसी एक को यह महसूस न हो कि उसके साथ दूसरे से कम व्यवहार किया जा रहा है।

परिवार के लिए दोनों बेटियों की सफलता और खुशियां समान महत्व रखती थीं। त्योहार हो, पारिवारिक समारोह हो या कोई अन्य खुशी का मौका, दोनों को समान रूप से शामिल किया जाता था।

इस तरह वर्षों के दौरान गोद ली गई बच्ची परिवार में सिर्फ एक सदस्य नहीं रही, बल्कि वह घर की बेटी और बहन के रिश्ते में पूरी तरह घुल-मिल गई।

24 साल में मजबूत हुआ रिश्ता

समय के साथ दोनों बच्चियां बड़ी हुईं और अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ीं। लेकिन बचपन से बनी बहन की भावनात्मक डोर कमजोर नहीं हुई। 24 साल की इस यात्रा ने साबित किया कि किसी बच्चे को परिवार का हिस्सा बनाने के लिए सिर्फ कानूनी प्रक्रिया पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उसे प्यार, सुरक्षा और स्वीकार्यता देना भी उतना ही जरूरी है।

सुनील और उनकी पत्नी ने यही किया। उन्होंने गोद ली गई बेटी को कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि वह परिवार में किसी दूसरे रिश्ते के कारण आई है। उसके लिए वह हमेशा उनकी बेटी रही।

समाज के लिए भी संदेश

यह कहानी उन परिवारों के लिए भी एक संदेश देती है जो किसी बच्चे को गोद लेने के बारे में सोचते हैं। बच्चे को परिवार में शामिल करना केवल उसे घर देने तक सीमित नहीं है। उसे बराबरी का अधिकार, सम्मान, भावनात्मक सुरक्षा और परिवार का हिस्सा होने का विश्वास देना भी जरूरी है।

सुनील कुमार के परिवार की कहानी इसी सोच को सामने रखती है। यहां गोद लेने के बाद बच्ची और माता-पिता के बीच रिश्ता समय के साथ और मजबूत हुआ। साथ ही दोनों बेटियों के बीच भी ऐसा रिश्ता बना, जिसमें उनके जन्म की परिस्थितियां कभी बाधा नहीं बनीं।

खून से बढ़कर अपनापन

आज 24 साल बाद यह परिवार इस बात की मिसाल है कि रिश्तों की मजबूती केवल जैविक संबंधों पर निर्भर नहीं करती। प्यार, सम्मान और अपनापन किसी भी रिश्ते को गहरा बना सकते हैं।

सुनील कुमार ने जिस बच्ची को दो माह की उम्र में गोद लिया था, उसे अपनी बेटी की तरह पाला। उनकी पत्नी ने भी दोनों बच्चियों के बीच फर्क नहीं किया। दोनों को साथ पढ़ाया, साथ बड़ा किया और हर खुशी में बराबर रखा।

इस परिवार की कहानी का सबसे भावुक पहलू यही है कि सुनील की अपनी बेटी को भी अपनी बहन के गोद लिए जाने की वजह से कोई दूरी महसूस नहीं हुई। उलटे, पिता के प्यार को लेकर उसकी मजाकिया टिप्पणी इस रिश्ते की सहजता को दर्शाती है।

24 साल पहले शुरू हुआ यह रिश्ता आज इस बात की मिसाल बन गया है कि परिवार सिर्फ जन्म से नहीं बनता। जहां प्यार, भरोसा और अपनापन हो, वहां रिश्तों को खून के रिश्ते की जरूरत नहीं होती।

Next Story