मध्य प्रदेश

21 पासबुक और 20 चेकबुक के साथ आरोपी गिरफ्तार

Kavita2
14 Sept 2026 12:13 PM IST
21 पासबुक और 20 चेकबुक के साथ आरोपी गिरफ्तार
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इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर में क्राइम ब्रांच ने अंतरराज्यीय साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। साइबर अपराध में इस्तेमाल होने वाले बैंक और म्यूल खातों के विरुद्ध चलाए जा रहे विशेष अभियान ‘ऑपरेशन मैट्रिक्स’ के तहत पुलिस ने ललित उर्फ ऋषि सुतार को गिरफ्तार किया है। पुलिस का दावा है कि आरोपी से जुड़े बैंक खातों का इस्तेमाल देश के विभिन्न राज्यों में हुई तीन करोड़ रुपये से अधिक की ऑनलाइन धोखाधड़ी की रकम को स्थानांतरित करने के लिए किया गया था।

पुलिस के मुताबिक आरोपी के कब्जे से बड़ी संख्या में बैंकिंग दस्तावेज और डिजिटल उपकरण बरामद हुए हैं। इनमें 21 बैंक पासबुक 20 चेकबुक आठ ATM कार्ड सात QR कोड और एक लैपटॉप शामिल है। इतनी बड़ी संख्या में बैंकिंग सामग्री मिलने के बाद क्राइम ब्रांच को आशंका है कि आरोपी साइबर अपराधियों के लिए बैंक खातों की व्यवस्था करने और ठगी से प्राप्त रकम को अलग-अलग खातों में भेजने का काम करता था।

प्रारंभिक जांच में आरोपी से जुड़े बैंक खातों का संबंध देशभर में दर्ज साइबर धोखाधड़ी की 50 से अधिक शिकायतों से मिलने का दावा किया गया है। इन खातों के माध्यम से तीन करोड़ रुपये से ज्यादा की संदिग्ध रकम का लेन-देन सामने आया है। हालांकि ठगी की कुल राशि और नेटवर्क में आरोपी की भूमिका का अंतिम निर्धारण विस्तृत जांच पूरी होने के बाद होगा।

पुलिस के अनुसार ललित उर्फ ऋषि सुतार कथित रूप से लोगों को कमीशन का लालच देकर उनके बैंक खाते हासिल करता था। खाताधारकों से बैंक पासबुक चेकबुक ATM कार्ड रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर और ऑनलाइन बैंकिंग से संबंधित जानकारी ली जाती थी। इसके बाद इन खातों का इस्तेमाल ऑनलाइन ठगी से प्राप्त रकम मंगाने और उसे दूसरे खातों में भेजने के लिए किया जाता था।

साइबर अपराध की भाषा में इस तरह के खातों को ‘म्यूल अकाउंट’ कहा जाता है। इनका इस्तेमाल अपराध से अर्जित रकम के वास्तविक स्रोत और उसके अंतिम लाभार्थी की पहचान छिपाने के लिए किया जाता है। साइबर ठगी की रकम पहले एक खाते में मंगाई जाती है और फिर बहुत कम समय में उसे कई दूसरे खातों में भेज दिया जाता है। कुछ मामलों में रकम ATM से निकाल ली जाती है जबकि कई बार डिजिटल वॉलेट QR कोड या अन्य भुगतान माध्यमों से आगे पहुंचाई जाती है।

जांच में महाराष्ट्र कर्नाटक राजस्थान पश्चिम बंगाल तेलंगाना आंध्र प्रदेश पंजाब बिहार और अंडमान-निकोबार सहित कई राज्यों में दर्ज शिकायतों से इन खातों का संबंध मिलने की जानकारी सामने आई है। पुलिस अब संबंधित राज्यों की साइबर अपराध इकाइयों से संपर्क कर शिकायतों और बैंक लेन-देन की जानकारी जुटा रही है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपी के पास से मिले प्रत्येक बैंक खाते का इस्तेमाल किस मामले में किया गया।

बरामद लैपटॉप की तकनीकी जांच भी कराई जा रही है। पुलिस इसमें मौजूद फाइलों ईमेल लॉगइन बैंकिंग रिकॉर्ड और दूसरे डिजिटल डेटा की जांच कर रही है। सात QR कोड से संबंधित खातों और भुगतान प्राप्त करने वाले लोगों की जानकारी भी निकाली जा रही है। जांच एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि ठगी की रकम को आगे किन खातों में भेजा गया और नेटवर्क के दूसरे सदस्य कहां से काम कर रहे थे।

क्राइम ब्रांच आरोपी से पूछताछ कर उन लोगों की पहचान करने में जुटी है जिन्होंने कथित रूप से अपने बैंक खाते उसे उपलब्ध कराए थे। इसके साथ यह भी जांचा जा रहा है कि खाताधारकों को इन खातों के आपराधिक इस्तेमाल की जानकारी थी या उन्हें नौकरी कारोबार या कमीशन का झांसा देकर बैंकिंग दस्तावेज हासिल किए गए। पुलिस का कहना है कि जानबूझकर अपना खाता साइबर अपराधियों को देना भी गंभीर अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

ऑपरेशन मैट्रिक्स के अंतर्गत इंदौर क्राइम ब्रांच साइबर ठगी में इस्तेमाल होने वाले बैंक खातों डिजिटल भुगतान माध्यमों मोबाइल नंबरों और इनके संचालकों की पहचान कर रही है। इस अभियान का उद्देश्य केवल ठगी करने वाले लोगों तक पहुंचना नहीं बल्कि रकम को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने वाली पूरी आर्थिक श्रृंखला को तोड़ना है। ललित उर्फ ऋषि सुतार की गिरफ्तारी को इसी अभियान की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है।

साइबर अपराधी अक्सर बेरोजगार युवाओं आर्थिक रूप से कमजोर लोगों और छोटे व्यापारियों को बैंक खाता उपलब्ध कराने के बदले कमीशन देने का लालच देते हैं। शुरुआत में खाताधारक को सामान्य लेन-देन बताया जाता है लेकिन बाद में उसी खाते से लाखों रुपये की ठगी की रकम गुजरती है। शिकायत दर्ज होने पर सबसे पहले बैंक खाते के वास्तविक धारक की पहचान सामने आती है और उसे कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

पुलिस और साइबर विशेषज्ञ लगातार लोगों को अपना ATM कार्ड पासबुक चेकबुक बैंक खाते से जुड़ा सिम कार्ड OTP और इंटरनेट बैंकिंग पासवर्ड किसी अन्य व्यक्ति को नहीं देने की सलाह देते हैं। बिना जानकारी के अपने खाते में बड़ी रकम स्वीकार करना और उसे किसी दूसरे खाते में भेजना भी व्यक्ति को साइबर अपराध के नेटवर्क में फंसा सकता है।

फिलहाल आरोपी पुलिस की गिरफ्त में है और उससे नेटवर्क के दूसरे सदस्यों के बारे में पूछताछ की जा रही है। बैंक खातों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच के बाद ठगी की रकम नेटवर्क की वास्तविक पहुंच और अन्य लोगों की भूमिका से जुड़े नए खुलासे होने की संभावना है। पुलिस के सभी आरोप अभी जांच के अधीन हैं और आरोपी की दोषसिद्धि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही तय होगी।

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