उत्तर प्रदेश

बखिरा में नियारा कारोबार का बड़ा नेटवर्क, पांच दशक से हजारों लोगों को रोजगार

Kavita2
18 Aug 2026 2:15 PM IST
बखिरा में नियारा कारोबार का बड़ा नेटवर्क, पांच दशक से हजारों लोगों को रोजगार
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संतकबीरनगर। बखिरा क्षेत्र में चल रहा नियारा का कारोबार अब केवल गांव की गलियों तक सीमित नहीं रह गया है। इस कारोबार का नेटवर्क नेपाल से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैल चुका है। दूसरे राज्यों के व्यापारी यहां नियारा की राख लेकर पहुंचते हैं और स्थानीय स्तर पर मजदूरों के माध्यम से इसकी धुलाई, छनाई और प्रसंस्करण का काम कराया जाता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, नियारा का कारोबार बखिरा और आसपास के क्षेत्रों में पिछले पांच दशक से भी अधिक समय से चल रहा है। सोना, चांदी और अन्य कीमती धातुओं की तलाश में शुरू हुआ यह काम अब क्षेत्र के हजारों लोगों की आजीविका का साधन बन चुका है।

बखिरा क्षेत्र के कई गांवों में नियारा कारोबार बड़े स्तर पर फैला हुआ है। इनमें लेडुआ महुआ, अमरडोभा, तरकुलवा, हारापट्टी, झुंगिया, छोटा गौरा और बड़ा गौरा समेत करीब एक दर्जन गांव शामिल हैं। इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग नियारा की धुलाई, सफाई और छनाई जैसे कामों से जुड़े हुए हैं।

व्यापारियों के अनुसार, नियारा की राख में कई बार कीमती धातुओं के छोटे कण मिलते हैं, जिन्हें अलग करने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसी कारण दूसरे राज्यों से व्यापारी यहां राख लेकर आते हैं और स्थानीय मजदूरों की मदद से उसमें मौजूद धातुओं को निकालने का प्रयास करते हैं।

यह कारोबार स्थानीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। बड़ी संख्या में ग्रामीणों को इसमें रोजगार मिलता है। खासकर मजदूर वर्ग के लोग इस काम से अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। कई परिवार पीढ़ियों से इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि नियारा कारोबार ने क्षेत्र में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए हैं। ग्रामीण इलाकों में जहां रोजगार के सीमित साधन हैं, वहां इस काम से लोगों को नियमित आय मिलती है। यही वजह है कि कई परिवार लंबे समय से इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।

हालांकि, इस कारोबार के साथ कुछ चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं। जानकारों का कहना है कि नियारा की धुलाई और प्रसंस्करण के दौरान इस्तेमाल होने वाले तरीकों से पर्यावरण और स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। इसके बावजूद प्रशासन की ओर से अब तक इस दिशा में प्रभावी निगरानी नहीं की गई है।

स्थानीय लोगों और पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि रोजगार देने वाले इस कारोबार को पूरी तरह बंद करने के बजाय इसे व्यवस्थित और सुरक्षित तरीके से संचालित करने की जरूरत है। इसके लिए प्रशासन को नियम तय करने और नियमित जांच की व्यवस्था करनी चाहिए।

क्षेत्र में बढ़ते कारोबार को देखते हुए अब यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या नियारा प्रसंस्करण के दौरान सुरक्षा मानकों का पालन किया जा रहा है या नहीं। यदि इसमें किसी तरह के रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है तो उसका प्रभाव आसपास के लोगों और पर्यावरण पर पड़ सकता है।

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन को इस कारोबार से जुड़े लोगों का सर्वे कराना चाहिए और यह पता लगाना चाहिए कि कितने लोग इससे जुड़े हैं। साथ ही, मजदूरों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर भी कदम उठाए जाने चाहिए।

बखिरा क्षेत्र में नियारा कारोबार का इतिहास काफी पुराना है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले यह काम छोटे स्तर पर होता था, लेकिन समय के साथ इसका विस्तार हुआ और अब दूसरे राज्यों के व्यापारी भी यहां पहुंचने लगे हैं।

नेपाल और देश के कई राज्यों तक फैले इस नेटवर्क से साफ है कि नियारा कारोबार अब एक संगठित रूप ले चुका है। व्यापारियों और मजदूरों के बीच एक पूरा तंत्र विकसित हो गया है, जो इस काम को आगे बढ़ा रहा है।

हालांकि, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के साथ पर्यावरण संरक्षण भी जरूरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी कारोबार से बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका जुड़ी है तो उसे खत्म करने के बजाय सुरक्षित और नियंत्रित तरीके से चलाने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए।

फिलहाल बखिरा और आसपास के गांवों में नियारा कारोबार लगातार जारी है। एक ओर जहां यह हजारों लोगों के लिए रोजगार का माध्यम बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर इससे जुड़े संभावित दुष्प्रभावों को लेकर प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। अब जरूरत है कि प्रशासन इस मामले में संतुलित नीति अपनाकर रोजगार और पर्यावरण दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

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