- Home
- /
- राज्य
- /
- उत्तर प्रदेश
- /
- काशी में अनोखी पहल:...
काशी में अनोखी पहल: मंदिरों में चढ़े फूलों से बन रही अगरबत्ती और गुलाल

वाराणसी। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में भगवान को अर्पित किए जाने वाले फूल अब कचरे में फेंकने के बजाय उपयोगी उत्पादों में बदले जा रहे हैं। वाराणसी में मंदिरों से निकलने वाले फूलों और पत्तियों से अगरबत्ती, धूप, हवन सामग्री और हर्बल गुलाल जैसे पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इस अनोखी पहल से धार्मिक स्थलों के आसपास स्वच्छता बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के साथ महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। कोमल सिंह की संस्था ईजी हेल्प वाराणसी नगर निगम के सहयोग से इस अभियान को आगे बढ़ा रही है। वर्तमान में शहर के लगभग 110 मंदिरों से प्रतिदिन करीब एक हजार किलोग्राम फूल और पत्तियां एकत्र की जा रही हैं। इसके लिए तीन ई-रिक्शा चलाए जा रहे हैं, जिन्हें 'पुष्प-रथ' नाम दिया गया है। इस पहल से करीब 70 से 80 महिलाओं को रोजगार भी मिल रहा है।
110 मंदिरों से रोजाना एक हजार किलो फूलों का संग्रह
काशी में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु विभिन्न मंदिरों में पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं। भगवान को फूल, माला और पत्तियां अर्पित करने की परंपरा के कारण धार्मिक स्थलों से काफी मात्रा में पुष्प अपशिष्ट निकलता है।
पहले इस तरह के फूलों के निस्तारण की समस्या बनी रहती थी। कई बार धार्मिक सामग्री जल स्रोतों तक पहुंचने से प्रदूषण की आशंका भी बढ़ जाती है।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए कोमल सिंह की संस्था ईजी हेल्प ने मंदिरों में चढ़ाए गए फूलों को एकत्र कर उनसे उपयोगी उत्पाद तैयार करने की पहल शुरू की।
वर्तमान में संस्था वाराणसी के करीब 110 मंदिरों से प्रतिदिन लगभग एक हजार किलो फूल और पत्तियां एकत्र कर रही है। इनका प्रसंस्करण कर विभिन्न प्रकार के उत्पाद बनाए जाते हैं।
तीन पुष्प-रथों से एकत्र किया जाता है फूलों का कचरा
मंदिरों से फूलों और पत्तियों को एकत्र करने के लिए संस्था ने विशेष व्यवस्था की है।
इसके तहत तीन ई-रिक्शा संचालित किए जा रहे हैं, जिन्हें पुष्प-रथ के नाम से जाना जाता है।
ये वाहन अलग-अलग मंदिरों से पूजा के बाद निकलने वाली फूल-मालाएं और पत्तियां एकत्र करते हैं। इसके बाद सामग्री को प्रसंस्करण के लिए निर्धारित स्थान पर पहुंचाया जाता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य मंदिरों में पुष्प अपशिष्ट जमा होने से रोकना और उसका व्यवस्थित पुनः उपयोग सुनिश्चित करना है।
ई-रिक्शा का इस्तेमाल होने से संग्रहण प्रक्रिया में पारंपरिक ईंधन से चलने वाले वाहनों पर निर्भरता भी कम होती है।
केवल 10 मंदिरों से हुई थी शुरुआत
कोमल सिंह के अनुसार, इस अभियान की शुरुआत महज 10 मंदिरों से फूल एकत्र करने के साथ हुई थी।
धीरे-धीरे इस पहल का विस्तार किया गया और वर्तमान में लगभग 110 मंदिर इससे जुड़ चुके हैं।
कोमल सिंह ने एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने शहर वाराणसी में पर्यावरण और महिलाओं के रोजगार से जुड़ा कार्य शुरू किया।
उनकी संस्था ईजी हेल्प का नगर निगम के साथ मंदिरों से निकलने वाले फूलों को एकत्र कर उनसे अगरबत्ती बनाने का अनुबंध है।
इस पहल ने धार्मिक अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
फूलों से ऐसे तैयार होती है अगरबत्ती और धूप
मंदिरों से एकत्र फूलों को सीधे उत्पाद बनाने में इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसके लिए कई चरणों की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
सबसे पहले फूलों और पत्तियों की छंटाई की जाती है। उपयोग के योग्य सामग्री को अलग कर लिया जाता है।
इसके बाद फूलों को बिना रासायनिक पदार्थों के प्राकृतिक तरीके से सुखाया जाता है। सूखने के बाद उनका बारीक पाउडर तैयार किया जाता है।
इसी पाउडर को विभिन्न उत्पादों के निर्माण में कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
वर्तमान में संस्था अगरबत्ती, धूप, ड्राई स्टिक धूप, हर्बल गुलाल और तुलसी पाउडर जैसे उत्पाद तैयार कर रही है।
इस प्रकार मंदिरों में चढ़ाए गए फूल दोबारा उपयोग में लाए जा रहे हैं।
70 से 80 महिलाओं को मिल रहा रोजगार
इस अभियान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि महिलाओं को आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना है।
संस्था से जुड़ी करीब 70 से 80 महिलाएं फूलों की छंटाई, सुखाने, प्रसंस्करण और उत्पाद निर्माण जैसी गतिविधियों में काम कर रही हैं।
इससे महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिल रहा है।
फूलों से तैयार उत्पादों की मांग बढ़ने पर भविष्य में रोजगार के और अवसर पैदा हो सकते हैं।
यह पहल महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाने का प्रयास है।
बेकार फूलों से जैविक खाद बनाने की तैयारी
संस्था का उद्देश्य भविष्य में मंदिरों से एकत्र होने वाले लगभग सभी पुष्प अपशिष्ट का उपयोग करना है।
कोमल सिंह के अनुसार, वर्तमान में एकत्र होने वाले फूलों में करीब 40 से 50 प्रतिशत सामग्री ऐसी होती है, जिसका इस्तेमाल अगरबत्ती या धूप बनाने में नहीं किया जा सकता।
ऐसे फूलों को सुरक्षित तरीके से अलग रखा जा रहा है।
भविष्य में इस सामग्री से जैविक खाद तैयार करने की योजना पर काम किया जा रहा है।
यदि यह प्रयास सफल होता है, तो उपयोग के योग्य नहीं रहने वाले फूलों का भी सही निस्तारण किया जा सकेगा।
गंगा और वरुणा नदी को प्रदूषण से बचाने का प्रयास
वाराणसी में धार्मिक महत्व के कारण प्रतिदिन बड़ी मात्रा में पूजा सामग्री निकलती है।
ऐसे अपशिष्ट का उचित प्रबंधन नहीं होने पर उसका कुछ हिस्सा गंगा और वरुणा जैसी नदियों तक पहुंच सकता है।
ईजी हेल्प की यह पहल मंदिरों से फूलों को अलग एकत्र कर जल स्रोतों में पहुंचने वाले पुष्प अपशिष्ट को कम करने में सहायक हो सकती है।
इससे शहर में स्वच्छता बनाए रखने और कचरा प्रबंधन व्यवस्था को बेहतर बनाने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
देश-विदेश तक उत्पाद पहुंचाने की योजना
संस्था फूलों से तैयार उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचाने की दिशा में भी प्रयास कर रही है।
अगरबत्ती, धूप और हर्बल गुलाल जैसे उत्पादों को पर्यावरण अनुकूल विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
आने वाले समय में इन उत्पादों की बाजार पहुंच बढ़ने से महिलाओं के रोजगार और संस्था की उत्पादन क्षमता को मजबूती मिल सकती है।
काशी की इस पहल से यह संदेश मिल रहा है कि धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है।
मंदिरों में भगवान को अर्पित फूलों का दोबारा उपयोग न केवल कचरा कम करने का माध्यम बन रहा है, बल्कि महिलाओं के लिए रोजगार का अवसर भी तैयार कर रहा है।





