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- 200 करोड़ ठगी केस में...

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी गिरोह का खुलासा हुआ है। यह गिरोह अमेरिकी नागरिकों को डिजिटल अरेस्ट कर करोड़ों रुपये की ठगी कर रहा था। पुलिस ने शहीद पथ स्थित ओमेक्स आर-2 सोसायटी में चल रहे फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़ करते हुए सात साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया है कि गिरोह ने महज आठ महीने में अमेरिकी नागरिकों से 200 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी की है।
क्राइम ब्रांच और साइबर सेल की संयुक्त टीम ने गुरुवार देर रात कार्रवाई करते हुए ओमेक्स आर-2 सोसायटी के चार फ्लैटों में चल रहे इस फर्जी कॉल सेंटर को पकड़ा। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि यह नेटवर्क किसी "मिनी जामताड़ा" से कम नहीं था। यहां से आरोपी विदेशी नागरिकों को निशाना बनाकर हाईटेक तरीके से ठगी करते थे।
पुलिस उपायुक्त अपराध अनिल यादव के अनुसार, आरोपी खुद को माइक्रोसॉफ्ट सपोर्ट कर्मचारी और फेडरल ट्रेड कमीशन (FTC) के अधिकारी बताकर अमेरिकी नागरिकों से संपर्क करते थे। इसके बाद उन्हें डराया जाता था कि उनके कंप्यूटर, बैंक खाते या सोशल सिक्योरिटी नंबर का इस्तेमाल किसी आपराधिक गतिविधि में किया गया है और उनके खिलाफ गिरफ्तारी की कार्रवाई हो सकती है।
गिरोह के सदस्य पहले पीड़ितों के कंप्यूटर और लैपटॉप पर वायरस और मैलवेयर से जुड़े फर्जी पॉप-अप भेजते थे। इन पॉप-अप में एक टोल फ्री नंबर दिया जाता था। जब कोई व्यक्ति उस नंबर पर संपर्क करता था तो आरोपी खुद को माइक्रोसॉफ्ट सपोर्ट अधिकारी बताकर बातचीत शुरू करते थे।
इसके बाद पीड़ितों को मानसिक दबाव में लिया जाता था। कॉल को दूसरे एजेंट को ट्रांसफर किया जाता था, जो खुद को एफटीसी या साइबर सुरक्षा एजेंसी का अधिकारी बताकर डर का माहौल बनाता था। भरोसा दिलाने के लिए आरोपी फर्जी सरकारी दस्तावेज, कोर्ट आदेश, आइडेंटिटी थेफ्ट रिपोर्ट और एफटीसी लेटर ई-मेल के जरिए भेजते थे।
जांच में पता चला कि ठग टीम व्यूअर और अल्ट्रा व्यूअर जैसे एप के माध्यम से पीड़ितों के कंप्यूटर का रिमोट एक्सेस हासिल कर लेते थे। इसके बाद बैंकिंग जानकारी और निजी डेटा चोरी कर लेते थे। गिरोह सीधे बैंक खातों में पैसे नहीं मंगाता था, बल्कि पीड़ितों से अमेजन और वॉलमार्ट के गिफ्ट कार्ड खरीदवाए जाते थे।
बड़ी रकम वाले मामलों में अमेरिका में मौजूद सहयोगियों की मदद से नकदी और सोने की डिलीवरी भी ली जाती थी। बाद में इस रकम को क्रिप्टोकरेंसी और डिजिटल वाउचर के माध्यम से ट्रांसफर किया जाता था, ताकि जांच एजेंसियों को वित्तीय लेनदेन का पता न चल सके।
पुलिस को छापेमारी के दौरान अमेरिका की रहने वाली एक महिला डोरिश से जुड़ा डेटा भी मिला है। आरोपियों ने उससे करीब 70 हजार डॉलर यानी लगभग 70 लाख रुपये की ठगी की थी। पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि जो भी व्यक्ति उनके जाल में फंस जाता था, उसके खाते को पूरी तरह खाली करने का प्रयास किया जाता था।
पुलिस के मुताबिक, यह गिरोह समिट बिल्डिंग में पकड़े गए अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटर की तरह ही काम कर रहा था। गिरोह विभिन्न राज्यों से युवाओं को भर्ती करता था। अंग्रेजी बोलने वाले और बीपीओ का अनुभव रखने वाले युवाओं को प्राथमिकता दी जाती थी। कर्मचारियों के रहने और खाने की व्यवस्था भी गिरोह द्वारा की जाती थी।
गिरफ्तार आरोपियों में अहमदाबाद निवासी पुनीत कुमार वर्मा और दीपेन चंद्र कांत पटेल के अलावा कोलकाता निवासी मोहम्मद सोहेल, मोहम्मद शाहनवाज, मोहम्मद इमरान, मोहम्मद रियाज और सज्जाद हुसैन शामिल हैं।
पुलिस ने आरोपियों के पास से आठ लैपटॉप, नौ मोबाइल फोन, नौ हेडफोन, चार वाई-फाई राउटर सहित अन्य सामान बरामद किया है। इसके अलावा विदेशी नागरिकों का डेटा, कॉलिंग स्क्रिप्ट, ई-मेल टेंपलेट और फर्जी दस्तावेज भी मिले हैं।
एडीसीपी क्राइम किरन यादव ने बताया कि मामले की जांच अभी जारी है। पुलिस गिरोह से जुड़े अन्य लोगों और विदेश में मौजूद सहयोगियों का पता लगाने में जुटी है। गिरफ्तार करने वाली टीम को 25 हजार रुपये का नकद इनाम भी दिया गया है।
यह कार्रवाई साइबर अपराध के बढ़ते खतरे के बीच महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पुलिस का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों से बचने के लिए लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है और किसी भी संदिग्ध कॉल, लिंक या ऑनलाइन मांग की तुरंत सूचना साइबर पुलिस को देनी चाहिए।





