उत्तर प्रदेश चुनाव अपडेट : बीजेपी में लगी इस्तीफ़ों की बाढ़ के बाद बाकी पार्टीयो का क्या है हाल, कांग्रेस-बीएसपी की क्या है स्तिथि

त्योहार लोहड़ी का है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुबह-सुबह लोगों को बधाई और शुभकामना का संदेश दिया. लेकिन दिन चढ़ते-चढ़ते त्योहार के दिन उनके बीजेपी खेमे में सन्नाटा पसर गया.
पिछले तीन दिन में बीजेपी के 10 से ज़्यादा विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया है जिसमें तीन मंत्री भी शामिल हैं. ये सब कुछ टिकट बंटवारे की घोषणा के ठीक पहले हो रहा है. संभावना जताई जा रही है कि इस्तीफ़ों की संख्या और बढ़ सकती है.
चुनावी मौसम में इस तरह से पार्टियों से नेताओं का निकलना और दूसरी पार्टियों में शामिल होना भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है. कुछ नेताओं का ऐसा करने पर सुर्ख़ियों में आना स्वाभाविक भी है.
लेकिन इस बार जो बात नई हुई है वो है इस्तीफ़ों की स्क्रिप्ट, अखिलेश यादव के फ़ोटो ट्वीट करने का सिलसिला और केशव प्रसाद मौर्य का उन नेताओं को मनाने वाला एक ट्वीट. ज़्यादातर इस्तीफ़े में यही पैटर्न देखने को मिला.
बीजेपी से निकलने वाले हर नेता ने कमोबेश अपने इस्तीफे़ में ग़रीब वंचित तबके के प्रति बीजेपी के बर्ताव को ज़िम्मेदार ठहराया. इस्तीफ़े की ख़बर आते ही अखिलेश यादव अपने साथ उनमें से कुछ-एक नेता की तस्वीर ट्वीट करते और उनके लिए स्वागत संदेश लिखते नज़र आए.
बीजेपी ने भी बुधवार को तीन चेहरे अपने साथ शामिल किए जिनमें से एक मुलायम सिंह यादव के क़रीबी बताए जाते हैं. लेकिन उसकी चर्चा मीडिया में कम हुई.
लोहड़ी के दिन ही कांग्रेस ने यूपी चुनाव के लिए 125 उम्मीदवारों की सूची जारी की. इसमें 50 महिलाओं को टिकट दिया गया. ये ख़बर हर जगह चली, लेकिन इतनी 'वायरल' नहीं हुई जितनी अखिलेश यादव की ट्वीट की गई फ़ोटो और इस्तीफ़े की स्क्रिप्ट.
इमरान मसूद का दल बदलना चर्चा में रहा, लेकिन उनके सगे भाई का बीएसपी में शामिल होने पर कहीं उफ़ तक नहीं हुई. जबकि मायावती ने लोहड़ी के दिन इस बारे में ट्वीट भी किया.
सा क्यों? उत्तर प्रदेश चुनाव में यूं तो आम आदमी पार्टी, एआईएमआईएम जैसी छोटी पार्टियां भी भाग्य आज़मा रही हैं और सपा,बीएसपी, भाजपा और कांग्रेस भी मैदान में हैं, लेकिन चर्चा में दो पार्टियां ज़्यादा रहती हैं.
बीजेपी और समाजवादी पार्टी पर ज़्यादा चर्चा
क्या उत्तर प्रदेश के चुनाव में मुख्य मुक़ाबला केवल दो पार्टियों समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच ही रह गया है या फिर कांग्रेस और बीएसपी भी ज़मीनी लड़ाई में अपना भविष्य देख सकते हैं?
चुनाव में राजनीतिक पार्टियों की सफलता-असफलता कई बातों पर निर्भर करती है जैसे पार्टी का संगठन और बूथ मैनेजमेंट कैसा है, टिकट बंटवारे में किन-किन बातों का ख़्याल रखा गया, हर सीट के जातिगत समीकरण कैसे हैं, पार्टी ने गठबंधन किनके साथ किया है, चुनाव से पहले प्रचार-प्रसार किसने, कितना किया आदि-आदि.
इसके अलावा पार्टी का मीडिया प्रबंधन और दूसरी कई बातें जीत हार तय करती है. इस बार कोरोना महामारी भी एक बहुत बड़ा फैक्टर है. वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन कहती हैं, "बड़े स्तर पर देखें तो उत्तर प्रदेश में मुख्य मुक़ाबला बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच है. पिछले 10-15 दिनों में परिस्थितियां तेज़ी से बदली हैं. जिस तरह से विधायकों का 'पलायन' बीजेपी से समाजवादी पार्टी की तरफ़ हो रहा है, उससे दो पार्टियों के बीच मुकाबला होने की बात को और बल मिलता है."
पिछले दो दिन में 10 से ज़्यादा विधायक इस्तीफ़ा दे चुके हैं जिनमें तीन मंत्री शामिल हैं.
वो आगे कहती हैं, "राजनीति में विधायकों को 'मौसम वैज्ञानिक' कहा जाता है क्योंकि वो जीत-हार का रूख़ पहले भांप लेते हैं. बीजेपी छोड़ने वालों का समाजवादी पार्टी में जाना इस बात का इशारा है कि विधायकों को भी लग रहा है मुकाबला इन्हीं दोनों के बीच है."





