त्रिपुरा

बांग्लादेशी नागरिकों की जेल सजा माफ, त्रिपुरा हाई कोर्ट का निर्देश

Tara Tandi
23 Sept 2026 7:45 PM IST
बांग्लादेशी नागरिकों की जेल सजा माफ, त्रिपुरा हाई कोर्ट का निर्देश
x
अगरतला: त्रिपुरा हाई कोर्ट ने भारत में गैर-कानूनी तरीके से घुसने के अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराए गए चार बांग्लादेशी नागरिकों की सज़ा में बदलाव किया है। राज्य सरकार द्वारा उन्हें वापस भेजने (डिपोर्टेशन) पर कोई आपत्ति न जताए जाने के बाद, कोर्ट ने राज्य अधिकारियों को उन्हें बांग्लादेश वापस भेजने का निर्देश दिया है।
जस्टिस टी. अमरनाथ गौड़ की सिंगल बेंच ने सोमवार को तीन आपराधिक अपीलों का निपटारा करते हुए ये आदेश दिए।
Crl A(J) 48/2026 मामले में, कोर्ट ने बांग्लादेश के मौलवीबाज़ार ज़िले के रहने वाले रतिलाल दास और उनकी पत्नी बिनीता रानी दास की अपील पर सुनवाई की। उन्होंने 1 नवंबर, 2025 को उनाकोटी, कैलाशहर के सेशंस जज द्वारा सुनाई गई सज़ा और दोषसिद्धि को चुनौती दी थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 27 फरवरी, 2025 को BSF की एक पेट्रोलिंग टीम ने श्रीरामपुर मनु ब्रिज के पास 16 लोगों को पकड़ा था। इनमें 13 बांग्लादेशी नागरिक और तीन भारतीय नागरिक शामिल थे, जिन पर दलाल (touts) के तौर पर काम करने का शक था।
इस जोड़े ने कथित तौर पर माना कि वे बांग्लादेशी नागरिक हैं और बिना वैध पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज़ों के भारत में दाखिल हुए थे।
सेशंस कोर्ट ने उन्हें पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 की धारा 3 (पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) नियम, 1950 के नियम 6 के साथ) और विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 14A(b) के तहत दोषी ठहराया था।
उन्हें विदेशी अधिनियम के तहत दो साल की कठोर सज़ा और प्रति व्यक्ति 10,000 रुपये का जुर्माना, तथा पासपोर्ट अधिनियम के तहत प्रति व्यक्ति 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
उनके वकील ने सज़ा कम करने की मांग करते हुए कहा कि वे गिरफ्तारी के बाद से ही हिरासत में हैं, उन्होंने अपनी पहचान नहीं छिपाई और अपना अपराध स्वीकार कर लिया था।
अन्य दो अपीलें, Crl A(J) 49 और 50/2026, क्रमशः लिजा और मंसूरा अख्तर द्वारा दायर की गई थीं।
इन दोनों महिलाओं को 4 जून, 2025 को धलाई, अंबासा के सेशंस जज ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 336(3) और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम की धारा 3(3) के तहत दोषी ठहराया था। BNS के प्रावधान के तहत उन्हें पांच साल की साधारण कैद और 10,000 रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई गई थी, और पासपोर्ट एक्ट के तहत दो साल की साधारण कैद और 10,000 रुपये जुर्माने की सज़ा दी गई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 6 अक्टूबर 2024 को अंबासा रेलवे स्टेशन पर चेकिंग के दौरान लिजा और एक अन्य महिला को हिरासत में लिया गया था, क्योंकि वे वहां अपनी मौजूदगी के बारे में संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई थीं।
पूछताछ के दौरान, उन्होंने कथित तौर पर बताया कि वे बांग्लादेशी नागरिक हैं और बिना वैध पासपोर्ट या वीज़ा के भारत में दाखिल हुई थीं।
दोनों महिलाओं ने ट्रायल कोर्ट के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था।
अपील के दौरान, उनके वकील ने सज़ा को उस अवधि तक कम करने की मांग की जो वे पहले ही काट चुकी थीं, या फिर उन्हें बांग्लादेश वापस भेजने का अनुरोध किया।
पब्लिक प्रॉसिक्यूटर राजू दत्ता ने सज़ा कम करने का विरोध करते हुए कहा कि अपील करने वाली महिलाएं अवैध रूप से भारत में दाखिल हुई थीं और अपनी गिरफ्तारी के बाद से ही हिरासत में थीं।
हाई कोर्ट ने उन्हें वापस भेजने (निर्वासन) के मामले में राज्य सरकार का रुख जानना चाहा। पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने कोर्ट के सामने त्रिपुरा गृह विभाग का 17 सितंबर का एक पत्र पेश किया, जिसमें कहा गया था कि सरकार को दोषी महिलाओं को जेल में बाकी सज़ा काटने के बजाय बांग्लादेश वापस भेजने में कोई आपत्ति नहीं है।
कोर्ट ने गौर किया कि अपील करने वाली महिलाओं का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और कहा कि चूंकि यह उनका पहला अपराध था, इसलिए उनके प्रति नरमी बरती जा सकती है।
इसके अनुसार, हाई कोर्ट ने तीनों अपीलों में सज़ा को उस अवधि तक सीमित कर दिया जो वे पहले ही काट चुकी थीं और बाकी बची सज़ा को माफ कर दिया।
कोर्ट ने राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे तय प्रक्रिया के अनुसार उन्हें बांग्लादेश वापस भेजने के लिए ज़रूरी कदम उठाएं।
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि चारों लोग वापस भेजे जाने तक जेल हिरासत में रहेंगे, लेकिन उस दौरान उनके साथ दोषियों जैसा व्यवहार नहीं किया जाएगा।
Next Story