त्रिपुरा
त्रिपुरा HC का आदेश: विवादित इमारत का होगा स्ट्रक्चरल असेसमेंट
Tara Tandi
5 Sept 2026 1:53 PM IST

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अगरतला: त्रिपुरा हाई कोर्ट ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (NIT), अगरतला के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट द्वारा एक विवादित बिल्डिंग की स्ट्रक्चरल कंडीशन (ढांचे की स्थिति) की जांच करने से इनकार करने पर नाराज़गी जताई है।
चीफ़ जस्टिस एम एस रामचंद्र राव और जस्टिस बिस्वजीत पालित की डिवीज़न बेंच एक रिट अपील पर सुनवाई कर रही थी, तभी यह मामला सामने आया।
बेंच ने NIT अगरतला के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के प्रोफ़ेसर और हेड द्वारा PWD (R&B) के चीफ़ इंजीनियर को 27 अगस्त को भेजे गए एक पत्र की समीक्षा की।
डिपार्टमेंट ने अधिकारियों को बताया था कि वे प्रस्तावित स्ट्रक्चरल असेसमेंट (ढांचे की जांच) नहीं कर सकते क्योंकि उनके फैकल्टी पहले से ही एकेडमिक, रिसर्च और एडमिनिस्ट्रेटिव कामों में व्यस्त हैं।
डिपार्टमेंट ने पोस्ट-ग्रेजुएट एडमिशन और मिड-सेमेस्टर परीक्षाओं की चल रही तैयारियों का भी ज़िक्र किया और कहा कि इन कामों के लिए फैकल्टी का उपलब्ध रहना ज़रूरी है।
कोर्ट ने इस जवाब पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। बेंच ने कहा, "हम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (NIT), अगरतला के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के प्रोफ़ेसर और हेड के रुख से पूरी तरह निराश हैं।"
कोर्ट ने कहा कि NIT जैसे संस्थान की भूमिका जन-हित से जुड़ी होती है और उसे न्यायपालिका सहित अन्य संस्थानों को तकनीकी सहायता देने में सक्षम होना चाहिए, जब ऐसी विशेषज्ञता की आवश्यकता हो।
इसके बाद बेंच ने त्रिपुरा इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (TIT), नरसिंहगढ़, अगरतला का रुख किया और उससे विवादित ढांचे के निरीक्षण और परीक्षण के लिए अपने सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट से उपयुक्त योग्यता वाले कर्मचारियों को नामित करने को कहा।
TIT को स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी इवैल्यूएशन रिपोर्ट, फ़ील्ड टेस्ट या टेक्निकल ऑडिट रिपोर्ट जमा करने के लिए चार हफ़्ते का समय दिया गया है। आदेश की जानकारी TIT के प्रिंसिपल को भी देने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर, 2026 को होगी।
यह कार्यवाही हबुल सरकार और एक अन्य व्यक्ति द्वारा त्रिपुरा राज्य और अन्य प्रतिवादियों के ख़िलाफ़ दायर याचिका से शुरू हुई थी।
यह विवाद एक बिल्डिंग के निर्माण में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है। 22 अप्रैल के अपने आदेश में, हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के इस दावे पर ध्यान दिया था कि B+G+4 मंज़िला रिहायशी बिल्डिंग के लिए मंज़ूरी ली गई थी, जबकि ग्राउंड फ़्लोर पर कथित तौर पर फ़र्नीचर की दुकान और गोदाम बनाया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने निर्माण की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए थे और मंज़ूर किए गए बिल्डिंग प्लान से हटकर निर्माण करने का आरोप लगाया था। इससे पहले कोर्ट ने त्रिपुरा म्युनिसिपल एक्ट, 1994 की धाराओं 130, 132 और 133 का ज़िक्र किया था, जो निर्माण के दौरान इमारतों के निरीक्षण और अनधिकृत निर्माण के ख़िलाफ़ कार्रवाई से संबंधित हैं।
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