त्रिपुरा
बांग्लादेशी नागरिकों को राहत: सजा माफ कर त्रिपुरा हाई कोर्ट ने भेजा वापस
Tara Tandi
24 Sept 2026 5:50 PM IST

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अगरतला: त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने भारत में अवैध प्रवेश के अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराए गए चार बांग्लादेशी नागरिकों की सजा में संशोधन किया है और राज्य सरकार द्वारा उनके निर्वासन पर कोई आपत्ति नहीं जताए जाने के बाद राज्य अधिकारियों को उन्हें बांग्लादेश वापस भेजने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति टी अमरनाथ गौड़ की एकल पीठ ने सोमवार को तीन आपराधिक अपीलों का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किये।
2026 के सीआरएल ए (जे) 48 में, अदालत ने बांग्लादेश के मौलवीबाजार जिले के निवासी रतिलाल दास और उनकी पत्नी बिनीता रानी दास द्वारा दायर अपील पर सुनवाई की। उन्होंने 1 नवंबर, 2025 को सत्र न्यायाधीश, उनाकोटी, कैलाशहर द्वारा दी गई अपनी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, बीएसएफ की एक गश्ती टीम ने 27 फरवरी, 2025 को श्रीरामपुर मनु ब्रिज के पास दलाल के रूप में काम करने के संदेह में 13 बांग्लादेशी नागरिकों और तीन भारतीय नागरिकों सहित 16 लोगों को पकड़ा।
दंपति ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि वे बांग्लादेशी नागरिक थे और वैध पासपोर्ट या अन्य यात्रा दस्तावेजों के बिना भारत में प्रवेश किया था।
सत्र न्यायालय ने उन्हें पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 की धारा 3, पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) नियम, 1950 के नियम 6 के साथ पठित, और विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 14ए(बी) के तहत दोषी ठहराया।
उन्हें विदेशी अधिनियम के तहत दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई और प्रत्येक पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया, इसके अलावा पासपोर्ट अधिनियम के तहत प्रत्येक पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।
उनके वकील ने सजा कम करने की मांग करते हुए कहा कि वे गिरफ्तारी के बाद से हिरासत में हैं, उन्होंने अपनी पहचान नहीं छिपाई है और अपना अपराध स्वीकार कर लिया है।
अन्य दो अपीलें, सीआरएल ए(जे) 49 और 50, 2026, क्रमशः लिजा और मंसूर अख्तर द्वारा दायर की गईं।
दोनों महिलाओं को 4 जून, 2025 को सत्र न्यायाधीश, धलाई, अंबासा द्वारा भारतीय न्याय संहिता की धारा 336(3) और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम की धारा 3(3) के तहत दोषी ठहराया गया था।
उनमें से प्रत्येक को बीएनएस प्रावधान के तहत पांच साल के साधारण कारावास और 10,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी, और पासपोर्ट अधिनियम के तहत दो साल के साधारण कारावास और 10,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, लिजा और एक अन्य महिला को 6 अक्टूबर, 2024 को अंबासा रेलवे स्टेशन पर चेकिंग के दौरान हिरासत में लिया गया था, क्योंकि वे कथित तौर पर वहां अपनी उपस्थिति के बारे में संतोषजनक जवाब देने में विफल रहीं।
पूछताछ के दौरान, उन्होंने कथित तौर पर खुलासा किया कि वे बांग्लादेशी नागरिक थे और बिना वैध पासपोर्ट या वीजा के भारत में दाखिल हुए थे।
दोनों महिलाओं ने निचली अदालत के समक्ष अपना दोष स्वीकार कर लिया था।
अपील के दौरान, उनके वकील ने सजा को पहले ही पूरी की जा चुकी अवधि तक कम करने या उन्हें बांग्लादेश वापस भेजने की मांग की।
लोक अभियोजक राजू दत्ता ने सजा कम करने का विरोध करते हुए कहा कि अपीलकर्ताओं ने अवैध रूप से भारत में प्रवेश किया था और गिरफ्तारी के बाद से हिरासत में हैं।
उच्च न्यायालय ने उनके निर्वासन पर राज्य की स्थिति मांगी। लोक अभियोजक ने अदालत के समक्ष त्रिपुरा गृह विभाग का 17 सितंबर का पत्र पेश किया, जिसमें कहा गया था कि सरकार को दोषी व्यक्तियों को शेष सजा काटने के लिए जेल में रखने के बजाय वापस बांग्लादेश भेजे जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।
अदालत ने कहा कि अपीलकर्ताओं के खिलाफ कोई पिछला आपराधिक इतिहास नहीं था और कहा कि नरम रुख अपनाया जा सकता है क्योंकि अपराध उनका पहला है।
उच्च न्यायालय ने तदनुसार तीनों अपीलों में सजा को पहले ही पूरी की जा चुकी अवधि तक संशोधित कर दिया और कारावास की शेष शर्तों को माफ कर दिया।
इसने राज्य अधिकारियों को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार बांग्लादेश में उनके प्रत्यावर्तन के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया।
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि चारों व्यक्ति स्वदेश वापसी तक जेल की हिरासत में रहेंगे लेकिन उस अवधि के दौरान उन्हें दोषी नहीं माना जाएगा।
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