त्रिपुरा

Tripura में कोजागरी लक्ष्मी पूजा की धूम, बाजारों में उमड़ी भारी भीड़

Ratna Netam
25 Oct 2026 3:02 PM IST
Tripura में कोजागरी लक्ष्मी पूजा की धूम, बाजारों में उमड़ी भारी भीड़
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अगरतला। त्रिपुरा में कोजागरी लक्ष्मी पूजा को लेकर श्रद्धालुओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। बंगाली हिंदू समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण पारंपरिक त्योहारों में शामिल इस पर्व की तैयारियों से राज्य के शहरी और ग्रामीण इलाकों में उत्सव का माहौल बना हुआ है। बाजारों में पूजा सामग्री खरीदने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। देवी लक्ष्मी की मूर्तियों, फूलों, धान की बालियों, मिट्टी के दीयों और अन्य धार्मिक सामग्रियों की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ देखी जा रही है।कोजागरी लक्ष्मी पूजा बंगाली हिंदू परिवारों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस अवसर पर परिवार के सदस्य एकत्र होकर देवी लक्ष्मी की विधि-विधान से आराधना करते हैं और घर में सुख, शांति, धन तथा समृद्धि की कामना करते हैं।
बाजारों में पूजा सामग्री की खरीदारी तेज
त्योहार को देखते हुए त्रिपुरा के विभिन्न बाजारों में चहल-पहल बढ़ गई है। पूजा सामग्री बेचने वाले दुकानदारों के यहां सुबह से ही ग्राहकों की आवाजाही बनी हुई है। विशेष रूप से मां लक्ष्मी की प्रतिमाओं, फूलों, धान की बालियों और सजावटी मिट्टी के दीयों की मांग देखने को मिल रही है।इसके अलावा घरों को सजाने के लिए विभिन्न प्रकार की सजावटी वस्तुएं भी खरीदी जा रही हैं। कई बाजारों में पटाखों की दुकानों पर भी ग्राहक पहुंच रहे हैं। त्योहार की तैयारियों में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सभी उत्साहपूर्वक भाग ले रहे हैं।ग्रामीण क्षेत्रों में भी पूजा को लेकर तैयारियां चल रही हैं। परिवार अपने घरों और पूजा स्थलों की साफ-सफाई कर उन्हें सजाने में जुटे हैं। बंगाली परिवारों में इस पर्व को पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार मनाने का विशेष महत्व है।
आश्विन पूर्णिमा की रात होती है विशेष पूजा
पारंपरिक हिंदू पंचांग के अनुसार, कोजागरी लक्ष्मी पूजा आश्विन मास की पूर्णिमा की रात मनाई जाती है। यह पर्व विशेष रूप से बंगाली हिंदू समुदाय में लोकप्रिय है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और उन भक्तों को आशीर्वाद देती हैं, जो श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी आराधना करते हुए जागरण करते हैं।देवी लक्ष्मी को धन, ऐश्वर्य, समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इसलिए इस दिन भक्त अपने परिवार की खुशहाली, आर्थिक स्थिरता और सुख-शांति के लिए विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
कोजागरी शब्द का क्या है धार्मिक अर्थ?
कोजागरी शब्द को संस्कृत के 'को जागर्ति' से जुड़ा माना जाता है, जिसका अर्थ है 'कौन जाग रहा है?' इस नाम के पीछे एक प्रचलित धार्मिक मान्यता है।मान्यता के अनुसार, पूर्णिमा की रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर आती हैं और देखती हैं कि कौन भक्त जागकर उनकी पूजा कर रहा है। जो श्रद्धालु पूरी आस्था के साथ जागरण और आराधना करते हैं, उन पर देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा होती है।इसी कारण अनेक परिवारों में रात के समय पूजा-पाठ, भजन और धार्मिक अनुष्ठान करने की परंपरा है। भक्त देवी लक्ष्मी से परिवार की समृद्धि और मंगलमय जीवन की प्रार्थना करते हैं।
घरों में अल्पना और पारंपरिक सजावट का महत्व
बंगाली संस्कृति में कोजागरी लक्ष्मी पूजा के अवसर पर घरों की विशेष सजावट की जाती है। कई परिवार अपने घरों के प्रवेश द्वार और पूजा स्थल पर चावल के घोल से पारंपरिक अल्पना बनाते हैं।इन अल्पनाओं में कमल के फूल और देवी लक्ष्मी के चरणों के प्रतीक बनाए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि मां लक्ष्मी के चरणों के चिह्न घर में उनके शुभ आगमन का प्रतीक होते हैं।पूजा के दौरान धान की बालियां, फल, मिठाइयां और अन्य पारंपरिक सामग्री अर्पित की जाती है। बंगाली परिवारों में धान को समृद्धि और अन्न की उपलब्धता से जोड़कर देखा जाता है।इस अवसर पर कई घरों में नारियल से बनी मिठाइयां और पारंपरिक प्रसाद तैयार किया जाता है। परिवार के सदस्य सामूहिक रूप से पूजा में शामिल होते हैं।
धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक परंपरा का संगम
त्रिपुरा में कोजागरी लक्ष्मी पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बंगाली समुदाय की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण उत्सव भी है।यह पर्व परिवारों को एक साथ आने, पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाने और नई पीढ़ी को धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने का अवसर देता है।राज्य के विभिन्न हिस्सों में त्योहार को लेकर दिखाई दे रहा उत्साह इसकी सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है। बाजारों की रौनक और घरों में चल रही तैयारियों के बीच श्रद्धालु देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए उत्सुक हैं।कोजागरी पूर्णिमा की रात भक्त मां लक्ष्मी की आराधना कर अपने परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य की कामना करेंगे। यह त्योहार आस्था के साथ-साथ पारिवारिक एकता, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने का संदेश भी देता है।
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