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त्रिपुरा की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर को संरक्षित करने पर जोर
Agartala: त्रिपुरा के पुराने अगरतला के खैरपुर में ऐतिहासिक चतुर्दश देवता मंदिर में बुधवार को सात दिन तक चलने वाली पारंपरिक खारची पूजा और मेले की शुरुआत हुई। इस मौके पर मुख्यमंत्री प्रो. डॉ. माणिक साहा ने पर्यटन और विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ त्रिपुरा की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए राज्य सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।
इस सालाना त्योहार का उद्घाटन करते हुए, डॉ. साहा ने त्रिपुरा के लोगों की शांति, समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और भलाई के लिए चतुर्दश देवता (चौदह देवताओं) से प्रार्थना की।
उन्होंने कहा, "मैं चतुर्दश देवता के प्रति अपना गहरा सम्मान व्यक्त करता हूं और त्रिपुरा के लोगों की खुशी, शांति, अच्छे स्वास्थ्य, समृद्धि और समग्र कल्याण के लिए प्रार्थना करता हूं। खारची पूजा का मुख्य उद्देश्य धरती माता का शुद्धिकरण और पुण्य की प्राप्ति है।"
खारची पूजा को केवल एक धार्मिक आयोजन से कहीं अधिक बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह त्योहार त्रिपुरा के समृद्ध इतिहास, सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक परंपराओं और आदिवासी व गैर-आदिवासी समुदायों के बीच सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है।
उन्होंने कहा, "खारची पूजा त्रिपुरा के सबसे पुराने पारंपरिक त्योहारों में से एक है। इसकी शुरुआत पुराने शाही परिवार के कुल देवताओं यानी चौदह देवताओं की पूजा से हुई थी, लेकिन आज यह एक ऐसा व्यापक त्योहार बन गया है जिसे पूरे राज्य के लोग मनाते हैं।"
मुख्यमंत्री ने बताया कि यह त्योहार हर साल आषाढ़ महीने की शुक्ल अष्टमी को मनाया जाता है और इसमें पारंपरिक रीति-रिवाज, मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल होते हैं। पुरानी यादों को ताजा करते हुए उन्होंने कहा कि पुल बनने से पहले भक्त इस त्योहार में शामिल होने के लिए नाव से हावड़ा नदी पार करते थे, जो उनकी गहरी आस्था और भक्ति को दर्शाता है।
राजमाला के ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए डॉ. साहा ने कहा कि चौदह देवताओं को शाही परिवार का मुख्य देवता माना जाता है और पारंपरिक मुख्य पुजारी 'चंताई' द्वारा सदियों पुरानी परंपराओं के अनुसार अनुष्ठान किए जाते हैं।
खारची पूजा के दौरान जिन देवताओं की पूजा की जाती है, वे हैं - हर, उमा, हरि, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय, गणेश, ब्रह्मा, पृथ्वी, समुद्र, गंगा, अग्नि, कामदेव और हिमाद्रि। जहां हर, उमा और हरि की पूजा पूरे साल की जाती है, वहीं बाकी देवताओं की पूजा खारची पूजा के दौरान की जाती है।
त्रिपुरा की सांस्कृतिक विविधता पर जोर देते हुए डॉ. साहा ने कहा कि यह त्योहार सामाजिक सद्भाव को मजबूत करता है और विभिन्न समुदायों, भाषाओं और परंपराओं के लोगों के बीच एकता को बढ़ावा देता है। इस साल का खारची उत्सव, जो 28 जुलाई तक चलेगा, "एक पेड़ माँ के नाम" थीम के तहत आयोजित किया जा रहा है। इसका मकसद पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के महत्व को उजागर करना है।
मुख्यमंत्री ने उत्सव में पर्यावरण जागरूकता को शामिल करने के लिए आयोजकों की सराहना की। उन्होंने बताया कि यहाँ लगभग 22 प्रदर्शनी स्टॉल लगाए गए हैं और देश के अलग-अलग हिस्सों से आए मशहूर कलाकार सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश कर रहे हैं।
चतुर्दश देवता मंदिर में पर्यटन की बढ़ती संभावनाओं का ज़िक्र करते हुए डॉ. साहा ने कहा कि यह मंदिर त्रिपुरा के सबसे अहम धार्मिक पर्यटन स्थलों में से एक बनकर उभरा है।
उन्होंने कहा, "पर्यटन विभाग ने मंदिर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को बनाए रखते हुए पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लिए आधुनिक सुविधाएँ देने के कई कदम उठाए हैं। अब हर साल देश-विदेश से हज़ारों लोग इस मंदिर के दर्शन करने आते हैं।"
विरासत के संरक्षण और बुनियादी ढाँचे के विकास के बीच संतुलन बनाए रखने के सरकार के संकल्प को दोहराते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने और उन्हें बढ़ावा देने पर खास ज़ोर दिया है।
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