तेलंगाना

नगर निगमों में ट्रांसजेंडर समुदाय को मिलेगा प्रतिनिधित्व तेलंगाना विधानसभा में बिल पारित

Kavita2
11 Sept 2026 5:26 PM IST
नगर निगमों में ट्रांसजेंडर समुदाय को मिलेगा प्रतिनिधित्व तेलंगाना विधानसभा में बिल पारित
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हैदराबाद। तेलंगाना विधानसभा ने शुक्रवार को ट्रांसजेंडर समुदाय को शहरी स्थानीय निकायों की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी देने वाला महत्वपूर्ण विधेयक पारित कर दिया। ‘तेलंगाना नगरपालिका (चौथा संशोधन) विधेयक, 2026’ के माध्यम से राज्य के नौ नगर निगमों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सहयोजित यानी को-ऑप्टेड सदस्य के रूप में शामिल करने का प्रावधान किया गया है। इन नगर निगमों में हैदराबाद के कोर अर्बन रीजन यानी CURE के बाहर आने वाले निकाय शामिल होंगे।

मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी की ओर से राज्य के विधायी मामलों के मंत्री डी. श्रीधर बाबू ने विधानसभा में यह विधेयक पेश किया। उन्होंने सदन को बताया कि प्रस्तावित कानूनी बदलाव का उद्देश्य ट्रांसजेंडर समुदाय को नगरपालिका प्रशासन और स्थानीय स्तर पर होने वाली निर्णय प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व देना है। विधेयक पारित होने के बाद अब समुदाय से जुड़े व्यक्ति नगर निगमों की बैठकों और शहरी विकास से जुड़े विमर्श में अपनी बात रख सकेंगे।

डी. श्रीधर बाबू ने कहा कि ट्रांसजेंडर समुदाय समाज का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन लंबे समय तक उसकी समस्याएं स्थानीय प्रशासन और नीति निर्माण की प्रक्रिया में पर्याप्त रूप से सामने नहीं आ सकीं। नगर निगमों में प्रतिनिधित्व मिलने से समुदाय से संबंधित मुद्दों को सीधे निकाय के समक्ष रखने का अवसर मिलेगा। इससे नागरिक सुविधाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े फैसलों में उनकी भागीदारी बढ़ेगी।

विधेयक के अनुसार, कोर अर्बन रीजन से बाहर स्थित नौ नगर निगमों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सहयोजित किया जाएगा। सहयोजन का अर्थ यह है कि संबंधित सदस्यों को सामान्य निर्वाचन प्रक्रिया से चुने जाने के बजाय निर्धारित प्रक्रिया के तहत निगम में शामिल किया जाएगा। सरकार को अब नियमों के माध्यम से यह स्पष्ट करना होगा कि उनका चयन किस प्रकार होगा, पात्रता के मानक क्या होंगे और उनका कार्यकाल तथा अधिकार किस सीमा तक निर्धारित किए जाएंगे।

नगरपालिका प्रशासन में ट्रांसजेंडर प्रतिनिधि की मौजूदगी कई मायनों में महत्वपूर्ण हो सकती है। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय के लोगों को आवास, रोजगार, पहचान पत्र, स्वास्थ्य सेवाएं, स्वच्छता, सार्वजनिक शौचालय और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंचने में कई स्तरों पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। निगम की बैठकों में समुदाय का प्रतिनिधि होने से इन समस्याओं को आधिकारिक मंच पर रखा जा सकेगा।

स्थानीय निकाय नागरिकों के दैनिक जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं। सड़कों, नालियों, पेयजल, सफाई, बाजार, आश्रय गृह, सार्वजनिक शौचालय, स्ट्रीट लाइट और शहरी स्वास्थ्य केंद्रों की व्यवस्था नगर प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आती है। इन सेवाओं की योजना बनाते समय ट्रांसजेंडर समुदाय की जरूरतों को समझने और शामिल करने में सहयोजित सदस्य की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अक्सर सामाजिक भेदभाव के कारण शिक्षा और औपचारिक रोजगार के अवसरों से वंचित होना पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप अनेक लोगों को असंगठित क्षेत्रों पर निर्भर रहना पड़ता है। निगम स्तर पर प्रतिनिधित्व मिलने से कौशल विकास, स्वरोजगार, स्ट्रीट वेंडिंग, छोटे व्यवसाय और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से समुदाय को जोड़ने के सुझाव सामने आ सकते हैं।

विधेयक का एक उद्देश्य प्रतिनिधित्व को केवल प्रतीकात्मक स्तर तक सीमित रखने के बजाय उसे शासन व्यवस्था का हिस्सा बनाना भी माना जा रहा है। हालांकि इसकी वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सहयोजित प्रतिनिधियों को निगम की समितियों, बैठकों और नीति संबंधी चर्चाओं में कितनी सक्रिय भूमिका दी जाती है। यदि उन्हें केवल नाममात्र की सदस्यता मिलती है तो समुदाय की समस्याओं में अपेक्षित बदलाव लाना कठिन होगा।

सरकार को चयन प्रक्रिया में भी पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी। समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य का ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों, स्थानीय समस्याओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से परिचित होना जरूरी होगा। प्रतिनिधियों के चयन में समुदाय से जुड़े संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय लेने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। इससे ऐसे लोगों को जिम्मेदारी मिल सकेगी जो जमीनी चुनौतियों को बेहतर तरीके से समझते हों।

नगर निगमों में शामिल किए जाने वाले प्रतिनिधियों को प्रशासनिक कामकाज, बजट, स्थानीय योजनाओं और कानूनी प्रावधानों का प्रशिक्षण देना भी उपयोगी होगा। उचित प्रशिक्षण मिलने से वे केवल समुदाय की शिकायतें उठाने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि समाधान तैयार करने और योजनाओं की निगरानी में भी योगदान दे सकेंगे। निगम अधिकारियों तथा निर्वाचित सदस्यों को भी संवेदनशीलता संबंधी प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी।

ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एक प्रमुख मुद्दा है। भेदभाव के डर और सुविधाओं की कमी के कारण कई लोग समय पर इलाज नहीं करा पाते। नगर निगमों के स्वास्थ्य केंद्रों में सम्मानजनक व्यवहार, अलग सहायता डेस्क और जरूरी चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था के लिए प्रतिनिधि सुझाव दे सकते हैं। इसी तरह बेघर या परिवार से अलग रह रहे लोगों के लिए आश्रय और पुनर्वास सुविधाओं की जरूरत पर भी ध्यान दिया जा सकता है।

सार्वजनिक स्थलों और सरकारी कार्यालयों में समावेशी सुविधाओं का विकास भी प्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है। सार्वजनिक शौचालयों में उपयुक्त विकल्प, सरकारी फॉर्म में सही लैंगिक पहचान और सहायता सेवाओं तक सरल पहुंच जैसे छोटे बदलाव समुदाय के दैनिक जीवन पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।

राज्य सरकार की यह पहल स्थानीय लोकतंत्र में सामाजिक समावेशन के नए मॉडल के रूप में देखी जा रही है। महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों की तरह ट्रांसजेंडर समुदाय की आवाज भी शासन व्यवस्था में पहुंचना जरूरी मानी जाती है। सहयोजन की व्यवस्था इस दिशा में शुरुआती कदम है, जिसे भविष्य में व्यापक प्रतिनिधित्व में बदला जा सकता है।

विधेयक पारित होने के बाद संबंधित नियम, नगर निगमों की सूची, सदस्यों की संख्या, चयन प्रक्रिया और अधिकारों को लेकर विस्तृत अधिसूचना जारी होने की उम्मीद है। इसके लागू होने पर यह स्पष्ट होगा कि प्रतिनिधियों को निगम की किन समितियों में शामिल किया जाएगा और वे बजट तथा विकास योजनाओं पर किस प्रकार अपनी राय रख सकेंगे।

फिलहाल विधानसभा से विधेयक पारित होना ट्रांसजेंडर समुदाय को शहरी शासन में औपचारिक स्थान देने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यदि इसका प्रभावी क्रियान्वयन किया गया तो स्थानीय प्रशासन में समुदाय की आवाज मजबूत होगी और उसकी वास्तविक जरूरतों पर आधारित योजनाएं बन सकेंगी।

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