तेलंगाना

Telangana की 700 साल पुरानी नाइकपोड मास्क परंपरा फिर हो रही जीवित, नई पीढ़ी ने संभाली विरासत

Harrison
24 April 2026 9:44 PM IST
Telangana की 700 साल पुरानी नाइकपोड मास्क परंपरा फिर हो रही जीवित, नई पीढ़ी ने संभाली विरासत
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Hyderabad हैदराबाद: तेलंगाना की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत मानी जाने वाली Naikpod Mask Tradition एक बार फिर पुनर्जीवित हो रही है। लगभग 700 साल पुरानी यह परंपरा, जो कभी खत्म होने की कगार पर पहुंच गई थी, अब कलाकारों की नई पीढ़ी के प्रयासों से फिर से जीवित की जा रही है।
इस परंपरा में लकड़ी से बनाए जाने वाले लगभग डेढ़ मीटर लंबे मास्क विशेष पहचान रखते हैं। ये मास्क लोक कथाओं और पौराणिक पात्रों को दर्शाते हैं और नाइकपोड समुदाय के धार्मिक, सांस्कृतिक तथा पारंपरिक आयोजनों का अहम हिस्सा रहे हैं।
ये मास्क न केवल कला का उदाहरण हैं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक अनुष्ठानों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। परंपरागत रूप से इन्हें त्योहारों और विशेष अवसरों पर उपयोग किया जाता था, जिससे समुदाय की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होती थी।
समय के साथ इस कला के उपयोग में कमी आने लगी। आधुनिक जीवनशैली, कम होती मांग और जागरूकता की कमी के कारण इस पारंपरिक शिल्प को बनाने वाले कारीगरों की संख्या घटने लगी। धीरे-धीरे यह परंपरा विलुप्त होने के खतरे में आ गई।
हालांकि, अब कुछ परिवारों ने इस परंपरा को फिर से जीवित करने की जिम्मेदारी उठाई है। ये कारीगर आज भी लगभग 15 से 20 प्रकार के मास्क तैयार करते हैं और नई पीढ़ी को इस पारंपरिक कला का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। इससे इस शिल्प को नई पहचान मिल रही है।
इसके साथ ही आदिवासी छात्र भी इस सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। खम्मम, आदिलाबाद, भद्राद्री कोठागुडेम और मुलुगु जिलों में इस परंपरा को दस्तावेजीकृत किया जा रहा है, ताकि इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व संरक्षित रह सके।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस कला को बढ़ावा देने के लिए इसे Geographical Indication Tag (GI टैग) दिलाने की प्रक्रिया भी चल रही है। GI टैग मिलने से इस पारंपरिक शिल्प को कानूनी और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल सकेगी, जिससे कारीगरों को आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों स्तर पर लाभ होगा।
स्थानीय स्तर पर इस परंपरा के पुनर्जीवन को एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे न केवल सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित हो रही है, बल्कि ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए रोजगार के अवसर भी बन रहे हैं।
फिलहाल, इस परंपरा को पुनर्जीवित करने के प्रयास जारी हैं और उम्मीद की जा रही है कि आने वाले वर्षों में नाइकपोड मास्क कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान मिलेगी।
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