तेलंगाना

Telangana: सुप्रीम कोर्ट के तस्करी से जुड़े फ़ैसले में UoH की रिसर्च का ज़िक्र

Tulsi Rao
11 Jun 2026 3:14 PM IST
Telangana: सुप्रीम कोर्ट के तस्करी से जुड़े फ़ैसले में UoH की रिसर्च का ज़िक्र
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हैदराबाद यूनिवर्सिटी (UoH) ने कहा है कि सोशल साइंस के रिसर्चर्स ने लगभग एक दशक पहले तस्करी, पुनर्वास और सर्वाइवर (पीड़ित) की आज़ादी को लेकर जो सवाल उठाए थे, उनका ज़िक्र सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले में किया गया है।

'प्रज्वला बनाम भारत संघ' मामले में 29 मई को आया यह फ़ैसला, हैदराबाद की तस्करी-विरोधी संस्था 'प्रज्वला' द्वारा 2004 में दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर आधारित था। इस याचिका में तस्करी और कमर्शियल यौन शोषण के पीड़ितों के लिए मज़बूत कानूनी सुरक्षा, पुनर्वास के उपाय और संस्थागत जवाबदेही की मांग की गई थी।

UoH के अनुसार, कोर्ट ने 'इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली' के 2016 के उस स्पेशल इश्यू का ज़िक्र किया जो मानव तस्करी पर केंद्रित था और जिसे इतिहासकार जेराल्डिन फोर्ब्स ने एडिट किया था। यह इश्यू 2014 में यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित 'वीमेंस वर्ल्ड कांग्रेस' में हुई चर्चाओं से निकला था।

जिन लोगों के काम को मान्यता दी गई, उनमें UoH की पूर्व छात्रा डॉ. बरनाली दास और प्रो. अजैलियू निउमाई शामिल थीं। डॉ. दास ने असम के शेल्टर होम्स की स्थितियों का अध्ययन किया और पुनर्वास के दौरान आज़ादी को लेकर सवाल उठाए, जबकि मणिपुर में तस्करी पर प्रो. निउमाई की रिसर्च ने सामाजिक बहिष्कार और क्षेत्रीय उपेक्षा को उजागर किया।

फ़ैसले में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि सिर्फ़ रेस्क्यू ऑपरेशन से ही न्याय की गारंटी नहीं मिलती, क्योंकि पीड़ितों को गरीबी, सामाजिक कलंक, ट्रॉमा और दोबारा तस्करी का सामना करना पड़ता है। इसमें पुनर्वास के दौरान गरिमा और मौलिक अधिकारों के महत्व को रेखांकित किया गया और पीड़ितों पर केंद्रित दृष्टिकोण, कानूनी सहायता और मज़बूत 'एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स' की ज़रूरत बताई गई।

प्रो. निउमाई ने कहा कि रिसर्च का यह ज़िक्र दिखाता है कि कैसे एकेडमिक रिसर्च व्यापक कानूनी और नीतिगत बहसों को आकार दे सकती है। यूनिवर्सिटी ने इस घटनाक्रम को अधिकारों, गरिमा और न्याय पर सार्वजनिक चर्चा को प्रभावित करने वाली रिसर्च के एक उदाहरण के तौर पर बताया।

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