तेलंगाना

Telangana: उच्च न्यायालय ने एमडीएस सीट अस्वीकृत करने के मानदंड पर प्रश्न उठाए

Tulsi Rao
26 Sept 2026 12:14 PM IST
Telangana: उच्च न्यायालय ने एमडीएस सीट अस्वीकृत करने के मानदंड पर प्रश्न उठाए
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हैदराबाद: तेलंगाना हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और कालोजी नारायण राव यूनिवर्सिटी ऑफ़ हेल्थ साइंसेज़ (KNRUHS) को यह बताने का निर्देश दिया है कि उन्होंने किस आधार पर एक BDS ग्रेजुएट को लोकल कैंडिडेट कोटा के तहत MDS में एडमिशन देने से मना किया। याचिकाकर्ता, वोनी साहित ने आंध्र प्रदेश में BDS पूरा किया था, लेकिन 2019-20 से 2022-23 तक कोनासीमा (KIMS) डेंटल कॉलेज, अमलापुरम में कोर्स करने के लिए तेलंगाना सरकार से पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप ली थी।

जब साहित ने 2026-27 के लिए सक्षम अथॉरिटी कोटा के तहत तेलंगाना में MDS में एडमिशन के लिए ऑनलाइन आवेदन किया, तो KNRUHS ने उनका नाम अयोग्य लोगों की लिस्ट में डाल दिया क्योंकि उन्होंने BDS तेलंगाना के बाहर से किया था। इसे चुनौती देते हुए वे हाई कोर्ट गए। कोर्ट ने राज्य और यूनिवर्सिटी को दो हफ़्ते के अंदर अपना जवाब (काउंटर-एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की सुनवाई टाल दी।

चीफ जस्टिस अपारेश कुमार और जस्टिस वाकिटी रामकृष्ण रेड्डी की डिवीजन बेंच ने याचिका पर सुनवाई करते हुए MDS एडमिशन के लिए लोकल स्टेटस तय करने के नियमों के बारे में पूछा और सवाल किया कि अगर याचिकाकर्ता को लोकल कैंडिडेट नहीं माना जाना था, तो राज्य ने उन्हें स्कॉलरशिप क्यों दी।

एडवोकेट-जनरल ए. सुदर्शन रेड्डी ने एक दूसरी बेंच के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केवल वे कैंडिडेट जिन्होंने प्रेसिडेंशियल ऑर्डर, 1974 के तहत तय "लोकल एरिया" में MBBS, BAMS या BHMS पूरा किया है, वे ही तेलंगाना में पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल कोर्स की काउंसलिंग में लोकल कैंडिडेट के लिए आरक्षित सीटों पर हिस्सा ले सकते हैं।

एडवोकेट-जनरल ने तर्क दिया कि आंध्र प्रदेश के किसी संस्थान में BDS करने के लिए तेलंगाना सरकार से स्कॉलरशिप लेने मात्र से याचिकाकर्ता को लोकल कैंडिडेट का स्टेटस नहीं मिल जाता। AG ने तर्क दिया कि उन्हें लोकल कैंडिडेट मानने से प्रेसिडेंशियल ऑर्डर और उसके तहत जारी सरकारी आदेशों में तय लोकल-एरिया नियमों का मकसद ही खत्म हो जाएगा। साहित के वकील ने कहा कि स्वास्थ्य, चिकित्सा और परिवार कल्याण विभाग द्वारा जारी GO 62, खास तौर पर तेलंगाना में मेडिकल और डेंटल कॉलेजों (MDS सहित) में एडमिशन से जुड़ा था, और एडवोकेट-जनरल द्वारा जिस फैसले का हवाला दिया गया था, उसमें इस आदेश के तहत तय किए गए मानदंडों पर विचार नहीं किया गया था।

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ज़मीन के मालिकाना हक से जुड़े विवाद पर फैसला करने का अधिकार राजस्व अधिकारियों के पास नहीं है

हैदराबाद: तेलंगाना हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ज़मीन के मालिकाना हक से जुड़े विवाद का फैसला राजस्व अधिकारियों द्वारा नहीं किया जा सकता है, और ऐसे मामलों का निपटारा केवल सक्षम सिविल कोर्ट द्वारा ही किया जाना चाहिए।

जस्टिस जी.एम. मोहिउद्दीन ने हरिकीर्ति आंजनेयुलु और अन्य द्वारा दायर एक रिट याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका यदाद्री भुवनगिरी के स्पेशल ट्रिब्यूनल के उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ताओं और श्री रामलिंगेश्वर स्वामी मंदिर द्वारा दावा की गई ज़मीन से जुड़े विवाद में पक्षों को सक्षम सिविल कोर्ट जाने का निर्देश दिया गया था। यह विवाद यदाद्री जिले के बिबिनगर मंडल के चिनारावलपल्ले में अलग-अलग सर्वे नंबरों वाली लगभग 44 एकड़ ज़मीन को लेकर निजी पक्षों और बंदोबस्ती विभाग (एंडोमेंट डिपार्टमेंट) के बीच था।

निजी पक्षों ने दावा किया कि उनके पूर्वज पट्टादार थे और उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड का हवाला दिया, जिसमें 1954-55 का खसरा पाहानी और उसके बाद के पाहानी रिकॉर्ड, साथ ही भूमि सुधार ट्रिब्यूनल के आदेश शामिल थे। उन्होंने तर्क दिया कि वे ज़मीन पर कब्ज़ा बनाए हुए थे और उसका इस्तेमाल कर रहे थे, और उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड में सुधार की मांग की। बंदोबस्ती विभाग ने 1958-59 के बाद के राजस्व रिकॉर्ड पेश किए, जिनमें पट्टादार कॉलम में श्री रामलिंगेश्वर स्वामी मंदिर का नाम और इस्तेमाल करने वालों (एन्जॉयमेंट) के कॉलम में याचिकाकर्ताओं का नाम दिखाया गया था।

निजी पक्षों ने भूमि सुधार ट्रिब्यूनल 1974 के आदेशों का हवाला दिया, जो घोषणा करने वालों के पास मौजूद सीलिंग क्षेत्र के निर्धारण से संबंधित थे, जिसमें विवादित ज़मीन को निजी पक्षों के पूर्वजों द्वारा अपनी संपत्ति के रूप में घोषित किया गया था। एंडोमेंट डिपार्टमेंट के रिकॉर्ड और रजिस्टर में इस ज़मीन को कभी भी एंडोमेंट प्रॉपर्टी के तौर पर नहीं दिखाया गया था, और न ही इसे रोक वाली लिस्ट (prohibition list) में शामिल किया गया था। एंडोमेंट डिपार्टमेंट ने इस ज़मीन पर अपना दावा 2019 में ही किया था।

कोर्ट ने कहा कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी से ही मालिकाना हक पक्का नहीं हो जाता। कोर्ट ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ताओं ने जिन लैंड रिफॉर्म्स ट्रिब्यूनल के आदेशों का हवाला दिया था, वे डिक्लेरेंट (घोषणा करने वाले) के पास मौजूद सीलिंग एरिया तय करने से जुड़े थे, न कि मालिकाना हक के विवाद को सुलझाने से।

कोर्ट ने गौर किया कि तहसीलदार ने रेवेन्यू रिकॉर्ड में सुधार के लिए याचिकाकर्ताओं की अर्ज़ी इस आधार पर खारिज कर दी थी कि विवाद में मालिकाना हक तय करना शामिल था, जो रेवेन्यू अथॉरिटी के अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

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