
हैदराबाद: दिवाली के त्योहार पर, चाहे इसके पीछे कोई भी ऐतिहासिक, पौराणिक या आध्यात्मिक कथा हो, 'दीये' अंधेरे पर प्रकाश की जीत का प्रतीक माने जाते हैं। आजकल, दिवाली पर पारंपरिक मिट्टी के दीये जलाने की जगह, लोग LED लाइटें, बिजली की लड़ियां और पानी से जलने वाले LED दीये इस्तेमाल करने लगे हैं।
मिट्टी की सोंधी महक, तिल के तेल की खुशबू और ताजे गेंदे के फूलों की जगह अब रंग-बिरंगी LED लाइटों और प्लास्टिक की सजावटों ने ले ली है। पूरे भारत में, त्योहारों की तैयारियों में अब 'सुविधा' को ज्यादा अहमियत दी जा रही है, जो एक बड़े सांस्कृतिक और आर्थिक बदलाव को दिखाती है। प्राकृतिक और पारंपरिक चीजों की जगह प्लास्टिक की बनी चीजों को अपनाने से, समाज न केवल दिवाली की असली आत्मा को खो रहा है, बल्कि उन पारंपरिक व्यवसायों (कुलावृत्तुलु) पर भी बुरा असर पड़ रहा है, जो पूरी तरह से त्योहारों पर ही निर्भर हैं। 72 वर्षीय कुम्हार मल्लम्मा, जो पांच दशकों से भी ज्यादा समय से मिट्टी के दीये बना रही हैं, आज अपने बिना बिके दीयों के पास बैठी हैं। उनका कहना है कि आजकल के बच्चों को प्लास्टिक की टिमटिमाती लाइटें ज्यादा पसंद आती हैं, जबकि वे नहीं जानते कि ये कृत्रिम लाइटें किसी कारीगर के घर का चूल्हा बुझा सकती हैं। यही हाल फूल बेचने वालों का भी है।
श्वेता त्रिपाठी: दिवाली पर इतनी सारी मिठाइयां और तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान खाए जाते हैं, इसलिए वर्कआउट करना भी बहुत जरूरी है।
फूल बेचने वाली तीसरी पीढ़ी की लक्ष्मी बताती हैं कि लोग अब असली फूलों की जगह प्लास्टिक के फूलों की मालाओं को ज्यादा पसंद कर रहे हैं, जिससे उनकी त्योहारों के दौरान होने वाली कमाई आधी रह गई है।
पारंपरिक तरीके से तेल निकालने वालों का काम भी अब लगभग ठप हो गया है।
तेल निकालने वाले कारीगर रमैया बताते हैं कि बिजली की लाइटों के चलन ने उनके पारंपरिक काम को खत्म कर दिया है, जिससे नई पीढ़ी को शहरों में जाकर दिहाड़ी-मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
शुभ कार्यों के लिए पारंपरिक डेयरी उत्पाद, खासकर शुद्ध घी बेचने वालों का काम भी अब खत्म होने की कगार पर है।
घी बनाने वाले सत्यनारायण बताते हैं कि लोग अब मोमबत्तियों या बिजली की लाइटों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे उनके पास आय का वह मुख्य जरिया नहीं बचता, जिससे वे अपना कर्ज चुका सकें या अपने मवेशियों को चारा खिला सकें।
सांस्कृतिक मूल्यों से गहराई से जुड़े बुजुर्ग, समुदाय के बीच आपसी सहयोग के इस नुकसान पर दुख जताते हैं।
रिटायर हो चुके स्कूल शिक्षक रमेश राव कहते हैं कि कुम्हार, फूल बेचने वाले और स्थानीय किसान अपनी आजीविका के लिए त्योहारों के महीनों पर निर्भर रहते हैं। वे सवाल उठाते हैं कि क्या प्लास्टिक की सजावटें सच में भारतीय विरासत को दर्शाती हैं? आज के उपभोक्ता कृत्रिम सुविधाओं के लिए अपनी पारंपरिक जड़ों को छोड़ते जा रहे हैं। वे यह भूल जाते हैं कि पारंपरिक शिल्प लाखों कारीगरों की आय का मुख्य स्रोत हैं, जो केवल अपने हाथों से बनी कलाकृतियों को बेचकर ही अपनी आजीविका चलाते हैं।
त्योहारों के महीने ही कमाई का वह एकमात्र मौसमी अवसर होते हैं, जो इन परिवारों को पूरे साल सहारा देते हैं। वरिष्ठ नागरिक पवन राज बताते हैं कि मिट्टी के दीये, पारंपरिक तरीके से निकाले गए तेल और ताजे फूल खरीदकर इन कारीगर समुदायों का समर्थन करना, हमारी राष्ट्रीय विरासत को सम्मान के साथ सहेजने जैसा है।
इन पारंपरिक विकल्पों को फिर से अपनाने से कारीगरों की आजीविका सुरक्षित रहती है और दिवाली की पवित्र भावना भी बनी रहती है।





