
तेलंगाना : निजामपेट मंडल मुख्यालय के पास इतिहास से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खोज सामने आई है। इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले BV बद्रागिरीश ने यहां मेगालिथिक काल (लगभग 4,000 BC) के कई प्राचीन पत्थर के घेरे (Stone Circles) खोजे हैं। यह खोज क्षेत्र के प्राचीन इतिहास और पुरातात्विक महत्व को उजागर करती है।
BV बद्रागिरीश तेलंगाना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में पर्यावरण इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं। नौकरी के साथ-साथ उन्हें इतिहास, पुरातत्व और पुराने सिक्कों के अध्ययन में विशेष रुचि है। इसी रुचि के चलते वे अक्सर ऐतिहासिक स्थलों और प्राचीन अवशेषों की तलाश करते रहते हैं। उनकी इसी खोजी प्रवृत्ति ने उन्हें निजामपेट के पास मौजूद हजारों साल पुराने अवशेषों तक पहुंचाया।
जानकारी के अनुसार, हाल ही में बद्रागिरीश नारायणखेड़ की यात्रा पर जा रहे थे। इसी दौरान सड़क से गुजरते समय उनकी नजर निजामपेट के पास कुछ असामान्य पत्थरों के घेरे पर पड़ी। उन्हें देखकर उन्हें संदेह हुआ कि ये सामान्य पत्थर नहीं बल्कि किसी प्राचीन सभ्यता से जुड़े अवशेष हो सकते हैं।
इसके बाद उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी और उस क्षेत्र का निरीक्षण शुरू किया। उन्होंने करीब 2 किलोमीटर के दायरे में घूमकर इन पत्थर के घेरों की तलाश की। जांच के दौरान उन्हें कई मेगालिथिक संरचनाएं मिलीं, जो प्राचीन मानव सभ्यता और उस समय की दफन परंपराओं से जुड़ी मानी जाती हैं।
मेगालिथिक काल की ऐसी संरचनाएं आमतौर पर बड़े पत्थरों से बनाई जाती थीं और इनका उपयोग कब्र या समाधि स्थलों के रूप में किया जाता था। भारत के कई हिस्सों में इस काल के पत्थर के घेरे, डोलमेन और अन्य दफन संरचनाएं मिली हैं। ये अवशेष उस समय के लोगों के जीवन, सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक मान्यताओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।
बद्रागिरीश ने बताया कि उन्हें इस क्षेत्र में एक समाधि अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में मिली। हालांकि, करीब 15 अन्य समाधियां खराब हो चुकी थीं। स्थानीय किसानों द्वारा उस इलाके में खेती शुरू किए जाने के कारण कई प्राचीन संरचनाओं को नुकसान पहुंचा है।
पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण बेहद जरूरी है, क्योंकि ये हजारों साल पुराने मानव इतिहास के प्रमाण होते हैं। यदि समय रहते इनकी पहचान और सुरक्षा नहीं की गई तो कृषि गतिविधियों, निर्माण कार्यों और अन्य मानवीय हस्तक्षेपों के कारण ये अवशेष पूरी तरह नष्ट हो सकते हैं।
इस खोज के बाद क्षेत्र के पुरातात्विक महत्व को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों का मानना है कि निजामपेट के आसपास का क्षेत्र प्राचीन सभ्यता से जुड़े कई रहस्यों को अपने भीतर समेटे हुए हो सकता है। आवश्यकता है कि विशेषज्ञों की टीम यहां विस्तृत सर्वेक्षण करे और इन संरचनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए।
मेगालिथिक काल मानव इतिहास का एक महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इस समय लोग बड़े पत्थरों का इस्तेमाल करके विभिन्न प्रकार की संरचनाएं बनाते थे। दफन स्थलों के रूप में बनाए गए पत्थर के घेरे उस समय की संस्कृति और जीवनशैली के बारे में जानकारी देने वाले महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
बद्रागिरीश की यह खोज इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि यह किसी बड़े पुरातात्विक अभियान के बजाय एक व्यक्ति की जिज्ञासा और इतिहास के प्रति रुचि का परिणाम है। उन्होंने अपनी नजर और जानकारी के आधार पर इन प्राचीन संरचनाओं को पहचाना और उनके संरक्षण की जरूरत को सामने रखा।
अब उम्मीद की जा रही है कि संबंधित विभाग इस क्षेत्र का निरीक्षण करेगा और यहां मौजूद मेगालिथिक अवशेषों की स्थिति का आकलन करेगा। यदि इन संरचनाओं को संरक्षित किया जाता है, तो यह स्थान भविष्य में इतिहास और पुरातत्व के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
निजामपेट के पास मिली यह खोज एक बार फिर यह साबित करती है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में आज भी प्राचीन सभ्यताओं के कई अनदेखे प्रमाण मौजूद हैं। जरूरत सिर्फ उन्हें पहचानने, संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की है।





