तेलंगाना
वोटिंग राइट्स पर SC: मताधिकार छीनना लोकतंत्र के खिलाफ और मनमाना रवैया
Tara Tandi
5 Oct 2026 1:14 PM IST

x
हैदराबाद: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को उस प्रक्रिया की कड़ी आलोचना की जिसके तहत वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में नागरिकों के नाम हटा दिए जाते हैं। उन्होंने इसे मनमाना और संविधान पर सीधा हमला बताया।
NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ में 19वीं जस्टिस बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, "अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों भारतीय नागरिक वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाते हैं (यानी ऐसे नागरिक जिनके पास वोट देने का अधिकार नहीं है), तो ऐसी प्रक्रिया मूल रूप से मनमानी है। किसी भी तरह के तर्क या बहाने से इसे सही नहीं ठहराया जा सकता।"
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो वर्गों की कल्पना नहीं करता—एक जिनके पास वोट देने का अधिकार हो और दूसरा जिनके पास न हो। उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया अनुच्छेद 326 (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करेगी। जस्टिस भुइयां ने कहा, "कोई भी अथॉरिटी ऐसा नहीं कर सकती; कोई भी अदालत इसे मंज़ूरी नहीं दे सकती। कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है।"
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वोट देने का अधिकार भारत की आज़ादी की लंबी लड़ाई से जुड़ा है और यह संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 326 में बिल्कुल भी बदलाव नहीं किया जा सकता। जस्टिस भुइयां ने आगे कहा कि मृत वोटर के मामले को छोड़कर, बिना नोटिस और सुनवाई के वोटर लिस्ट से किसी का नाम नहीं हटाया जा सकता।
उन्होंने कहा कि नागरिकता से वोट देने के अधिकार को अलग करना "शरीर से आत्मा को निकालने जैसा" होगा।
ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट के 'विशेष गहन संशोधन' (Special Intensive Revision) के तहत बड़े पैमाने पर नाम हटाने और सुप्रीम कोर्ट में इससे जुड़ी याचिकाओं को लेकर विवाद चल रहा है।
जस्टिस भुइयां के बयान भारतीय लोकतंत्र की एक ऐसी नींव के तौर पर वयस्क मताधिकार के संवैधानिक संरक्षण को मज़बूत करते हैं जिस पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
Next Story





