
हैदराबाद: हैदराबाद स्थित स्पेस-टेक स्टार्टअप 'कॉस्मोसर्व स्पेस' ने गुरुवार को भारत की पहली ऐसी निजी सुविधा (फैसिलिटी) का उद्घाटन किया, जहाँ निष्क्रिय उपग्रहों (सैटेलाइट्स) को पकड़ने, अंतरिक्ष के कचरे को हटाने और कक्षा (ऑर्बिट) में मौजूद अंतरिक्ष यानों की सर्विसिंग करने वाली तकनीकों को विकसित और टेस्ट किया जा सकेगा। कंपनी के अनुसार, 'बेस 1' (Base 1) नाम की यह सुविधा दुनिया भर में अपनी तरह की छठी फैसिलिटी है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह और आईटी मंत्री डी. श्रीधर बाबू द्वारा उद्घाटन की गई इस फैसिलिटी में सैटेलाइट सर्विसिंग सिस्टम को डिज़ाइन करने, बनाने और टेस्ट करने के लिए ज़रूरी बुनियादी ढांचा मौजूद है। इसमें 'ऑर्बिटल रेंडेवू एंड कैप्चर लैब', 'स्पेस रोबोटिक्स इनोवेशन लैब', एक 'ISO क्लास 8 क्लीन रूम' और एक 'मिशन सिमुलेशन एंड कंट्रोल सेंटर' शामिल हैं। यह बुनियादी ढांचा निष्क्रिय उपग्रहों को पकड़ने के लिए रोबोटिक सिस्टम विकसित करने के साथ-साथ, अंतरिक्ष में मरम्मत और ईंधन भरने (रीफ्यूलिंग) की तकनीकों को तैयार करने में मदद करेगा।
श्रीधर बाबू ने बताया कि राज्य सरकार एक साल के भीतर 'स्पेस टेक्नोलॉजी पॉलिसी' लाने की योजना बना रही है। हैदराबाद में 30 से ज़्यादा ऐसी स्पेस-टेक कंपनियाँ हैं जो लॉन्च व्हीकल, स्पेस डेटा सेंटर और अंतरिक्ष का कचरा हटाने जैसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं। उन्होंने यह भी घोषणा की कि 'यंग इंडिया स्किल्स यूनिवर्सिटी' (जो उद्योग जगत द्वारा संचालित है) में स्पेस टेक्नोलॉजी को 34वें क्षेत्र के रूप में शामिल किया जाएगा।
कॉस्मोसर्व एक 'डुअल-स्पेसक्राफ्ट सिस्टम' (दो अंतरिक्ष यानों वाला सिस्टम) विकसित कर रही है। इसमें एक बड़ा ऑर्बिटल स्टेशन 'रीफ्यूलिंग और लॉजिस्टिक्स हब' के रूप में काम करेगा, जबकि छोटे स्वायत्त (ऑटोनॉमस) यान उपग्रहों को पकड़ने, उनकी जांच करने, मरम्मत करने या उन्हें हटाने का काम करेंगे। कंपनी का लक्ष्य है कि टेक्नोलॉजी के सफल प्रदर्शन के बाद, 2028 की शुरुआत तक अंतरिक्ष का कचरा हटाने का कमर्शियल काम शुरू कर दिया जाए।
इस तरह की सेवाओं की ज़रूरत इसलिए बढ़ रही है क्योंकि पृथ्वी की कक्षा में निष्क्रिय उपग्रहों और उनके टुकड़ों की भीड़ जमा हो गई है, जो काम कर रहे अंतरिक्ष यानों और भविष्य के लॉन्च के लिए खतरा बन गई है। कॉस्मोसर्व का अनुमान है कि कक्षा में मौजूद लगभग 28,000 उपग्रहों में से करीब 10,000 उपग्रह अब काम नहीं कर रहे हैं। इनकी तकनीक को इस तरह डिज़ाइन किया जा रहा है कि यह 10 सेमी के छोटे टुकड़ों से लेकर 500 किलोग्राम तक के उपग्रहों (कचरे) को संभाल सके।





