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तेलंगाना के एक युवा ने नागालैंड की सबसे ऊंची चोटी, 3,841 मीटर ऊंचे माउंट सारामाती पर चढ़ाई पूरी की है। इसके साथ ही, भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सबसे ऊंची चोटियों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के उनके अभियान का 'सेवन-सिस्टर' (पूर्वोत्तर के सात राज्यों) वाला चरण पूरा हो गया है। तेलंगाना के महबूबाबाद जिले के भुक्या थांडा गांव के रहने वाले भुक्या यशवंत ने 20 सितंबर को नागालैंड की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ाई करके अब तक 11 राज्यों की सबसे ऊंची चोटियों पर तिरंगा फहराया है। इससे पहले वे अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और गोवा की चोटियों पर चढ़ाई कर चुके हैं।
यशवंत ने कहा कि उन्होंने यह मिशन पर्वतारोहण के जुनून और सभी 28 राज्यों की सबसे ऊंची चोटियों का रिकॉर्ड बनाने की इच्छा से शुरू किया था, न कि केवल मशहूर ऊंची चोटियों तक ही सीमित रहने के लिए। उन्होंने कहा, "सेवन समिट्स (दुनिया के सात महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों) की तैयारी के दौरान मुझे एहसास हुआ कि किसी ने भी सभी राज्यों की सबसे ऊंची चोटियों तक की यात्रा का रिकॉर्ड नहीं बनाया है। इसलिए, मैंने यह मिशन शुरू करने का फैसला किया।"
'सेवन समिट्स' का मतलब सात पारंपरिक महाद्वीपों में से प्रत्येक की सबसे ऊंची चोटियों से है। केंद्र सरकार के 'हर घर तिरंगा' अभियान से प्रेरित होकर, यशवंत हर राज्य की सबसे ऊंची चोटी पर राष्ट्रीय ध्वज ले जाते हैं और वहां के परिदृश्य, लोगों और खासियतों का रिकॉर्ड भी रखते हैं।
उनका अनुभव सिर्फ राज्यों की चोटियों पर चढ़ने की चुनौती तक ही सीमित नहीं है। उन्होंने भारत में कई बड़े अभियान पूरे किए हैं, जिनमें अरुणाचल प्रदेश में माउंट गोरिचेन, हिमाचल प्रदेश में माउंट रियो पुरग्यिल और लद्दाख में कांग यातसे II पर चढ़ाई शामिल है। उनकी पर्वतारोहण यात्रा उन्हें रूस में माउंट एल्ब्रस और तंजानिया में माउंट किलिमंजारो तक भी ले गई है।
उन्होंने कहा, "हर पहाड़ अपने आप में अनोखा होता है। यह सिर्फ ऊंचाई की बात नहीं है।" नागालैंड आने से पहले, उन्होंने लद्दाख में 6,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले एक अभियान को पूरा किया था। उन्होंने कहा, "लेकिन माउंट सारामाती ने एक अलग तरह की चुनौती पेश की।" शिलांग से सफ़र शुरू करके सारामाती के प्रवेश द्वार 'थानामीर' तक पहुँचने और वहाँ से चढ़ाई करने में उन्हें जंगलों, खड़ी ढलानों और फिसलन भरे रास्तों से गुज़रते हुए लगभग तीन दिन लगे। इस अभियान में असम राइफल्स के एक अधिकारी समेत करीब 10 से 12 लोग शामिल थे।
यशवंत ने कहा, "रास्ता बहुत खड़ा और फिसलन भरा था। हमें हर कदम पर सतर्क और सावधान रहना पड़ा।" मौसम चिंता का विषय था, लेकिन चोटी पर चढ़ाई के दौरान बारिश रुक गई और टीम के कैंप लौटने के बाद ही दोबारा शुरू हुई। उन्होंने कहा, "ऐसा लगा जैसे प्रकृति हमें कोई सबक सिखा रही हो। अगर आप प्रकृति का सम्मान करते हैं, तो वह हमेशा आपकी रक्षा करती है।" इस सफ़र के दौरान उन्हें रास्ते में पड़ने वाले समुदायों से बातचीत करने का मौका भी मिला। यशवंत ने बताया कि स्थानीय लोग बहुत मिलनसार थे; कुछ लोग तो अभियान में शामिल भी हुए और टीम की मदद की।
उन्होंने कहा, "वहाँ के लोग बहुत दयालु, विनम्र और स्वागत करने वाले थे। मुझे उनकी मेहमाननवाज़ी और हमारे प्रति दिखाए गए स्नेह ने बहुत प्रभावित किया।" यशवंत ने इस सफलता के लिए असम राइफल्स के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल विकास लखेरा का भी धन्यवाद किया। अभी 17 राज्यों की यात्रा बाकी है और यशवंत को उम्मीद है कि वह एक साल के भीतर सभी 28 राज्यों की यात्रा पूरी कर लेंगे। फंड का इंतज़ाम करना और हर अभियान का पेशेवर तरीके से दस्तावेज़ीकरण करना उनके सामने आने वाली चुनौतियों में शामिल है। उनकी तत्काल योजनाओं में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और तेलंगाना की सबसे ऊँची चोटियों पर अभियान चलाना शामिल है।
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