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हैदराबाद। भारत राष्ट्र समिति (BRS) के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामा राव (KTR) ने गुरुवार को भारत निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और दोबारा जोड़ने से जुड़े फैसलों पर चुनाव आयोग के तीन में से दो सदस्यों द्वारा कथित तौर पर बार-बार आपत्ति दर्ज किए जाने संबंधी रिपोर्टों का हवाला दिया। KTR ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया की समीक्षा और उस पर सार्वजनिक चर्चा जरूरी है।KTR ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की आलोचना की। उन्होंने लिखा कि भारत खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, लेकिन लोकतंत्र की रक्षा के लिए जिम्मेदार संस्था के कामकाज को लेकर गंभीर सवाल सामने आ रहे हैं। उन्होंने आयोग को लेकर ‘लगभग तानाशाही’ वाला शब्द इस्तेमाल किया। यह KTR का राजनीतिक आरोप और आकलन है, न कि चुनाव आयोग के बारे में कोई स्थापित निष्कर्ष।
बहुमत के सिद्धांत पर KTR ने उठाया सवाल
KTR ने चुनाव आयोग की तीन सदस्यीय संरचना का जिक्र करते हुए कहा कि यदि तीन सदस्यों में से दो किसी मुद्दे पर आपत्ति दर्ज करते हैं तो बहुमत के सिद्धांत के अनुसार उनकी राय महत्वपूर्ण होनी चाहिए।उन्होंने कहा, “तीन में से दो का मतलब बहुमत होता है, या कम से कम पहले तो ऐसा ही होता था। लगता है कि अब इसकी परिभाषा बदल रही है।”KTR का यह बयान उन मीडिया रिपोर्टों के बाद आया है जिनमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से आयोग के कुछ फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात कही गई है।
10 महीने में 14 आपत्तियों की रिपोर्ट
द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के विभिन्न फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, मतदाता सूची से संबंधित अपील तथा चुनावी डेटाबेस के नियंत्रण जैसे विषयों से जुड़ी थीं।रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने कुछ मामलों में कहा कि फैसले या निर्देश उनकी जानकारी अथवा मंजूरी के बिना जारी किए गए। कुछ आपत्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।इन्हीं रिपोर्टों को आधार बनाकर KTR ने सवाल किया कि जब तीन सदस्यीय आयोग के दो सदस्य लगातार आपत्तियां दर्ज कर रहे थे तो उन आपत्तियों को किस तरह से निपटाया गया।
Form-6 में बदलाव पर भी विवाद
रिपोर्ट में मतदाता बनने के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में किए गए बदलाव का भी उल्लेख किया गया है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव को लेकर आपत्ति जताई थी।रिपोर्ट में कहा गया कि SIR से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा Form-6 में जोड़ी गई थी। आयोग के दोनों सदस्यों ने कथित तौर पर कहा था कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए नियमों में संशोधन की आवश्यकता है। बाद में संधू ने इसे ‘अनधिकृत और अवैध’ बताते हुए हटाने की बात कही थी।यह विवरण मीडिया द्वारा देखे गए आंतरिक रिकॉर्ड पर आधारित है और इस विवाद को लेकर चुनाव आयोग का पक्ष भी सामने आया है।
वोटर डेटाबेस को लेकर भी उठे सवाल
रिपोर्ट में चुनावी डेटाबेस और ECINet के संचालन से जुड़े मतभेदों का भी जिक्र किया गया है। बताया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची के डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकृत होने को लेकर चिंता व्यक्त की थी।रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने सवाल उठाया था कि स्थानीय स्तर पर मतदाता सूची तैयार करने के लिए जिम्मेदार निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की भूमिका और तकनीकी पहुंच प्रभावित नहीं होनी चाहिए। दोनों आयुक्तों ने इस विषय पर कैबिनेट सचिव तक अपनी चिंताएं पहुंचाई थीं।KTR ने इन्हीं घटनाक्रमों का हवाला देते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की अधिक जांच और निगरानी की जरूरत बताई।
कानून में क्या है बहुमत का नियम
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों से संबंधित 2023 के कानून में आयोग की निर्णय प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार, आयोग के कामकाज को जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से संचालित किया जाना चाहिए।यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी विषय पर मतभेद होता है तो फैसला बहुमत की राय के आधार पर किया जाना है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी लिखित टिप्पणियों में इन कानूनी प्रावधानों का भी उल्लेख किया था।इसी प्रावधान को आधार बनाते हुए KTR ने अपने बयान में ‘तीन में से दो’ के बहुमत का सवाल उठाया है।
चुनाव आयोग का पक्ष भी आया सामने
आंतरिक मतभेद की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने इन दावों को अलग संदर्भ में पेश किया है। रिपोर्टों के मुताबिक, आयोग के सूत्रों का कहना है कि SIR समेत चुनाव आयोग के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और तीनों सदस्यों की मंजूरी इनमें शामिल थी।आयोग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, किसी प्रस्ताव पर विचार के दौरान अलग-अलग टिप्पणियां, सुझाव या आपत्तियां सामने आना निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। उनका कहना है कि अंतिम फैसलों को तीनों सदस्यों की सहमति मिली थी।इसलिए दो आयुक्तों की लिखित आपत्तियों और आयोग के अंतिम फैसलों को लेकर सामने आए इन दोनों पक्षों के बीच अंतर महत्वपूर्ण है।
विपक्षी दलों ने तेज किए सवाल
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आने के बाद कई विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से स्पष्टीकरण की मांग की है। अलग-अलग विपक्षी दलों के नेताओं ने खास तौर पर मतदाता सूची और SIR से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता का मुद्दा उठाया है।KTR की प्रतिक्रिया भी इसी राजनीतिक बहस का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के भीतर यदि दो सदस्य लगातार आपत्तियां दर्ज करते हैं तो उनके द्वारा उठाए गए सवालों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
SIR को लेकर पहले से जारी है विवाद
देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस पहले से जारी है। इस प्रक्रिया में मतदाता सूची की जांच, नाम जोड़ने, हटाने और पात्रता से जुड़े मामलों पर विभिन्न राजनीतिक दलों ने सवाल उठाए हैं।अब आयोग के भीतर दो सदस्यों की लिखित आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्ट ने इस बहस को नया आयाम दिया है। हालांकि रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियां और आयोग की अंतिम निर्णय प्रक्रिया अलग-अलग चरणों से संबंधित हो सकती हैं, इसलिए पूरे घटनाक्रम को दोनों पक्षों के स्पष्टीकरण के साथ देखा जाना जरूरी है।KTR ने फिलहाल इसी विवाद को आधार बनाकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, बहुमत के सिद्धांत और संस्थागत जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर आयोग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। ऐसे में अब बहस इस बात पर केंद्रित है कि आंतरिक आपत्तियों को किस प्रक्रिया के तहत निपटाया गया और आयोग के अंतिम निर्णयों तक पहुंचने में तीनों सदस्यों की भूमिका क्या रही।
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