
हैदराबाद: तेलंगाना हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई कॉन्ट्रैक्ट वर्कर किसी सरकारी विभाग से वेतन का दावा करता है, तो उसे सबसे पहले यह साबित करना होगा कि उसके और विभाग के बीच नियोक्ता-कर्मचारी (employer-employee) का रिश्ता था। सिर्फ़ इसलिए कि विभाग ने काम कॉन्ट्रैक्टरों को सौंपा था, ऐसा रिश्ता नहीं माना जा सकता।
जस्टिस लक्ष्मी नारायण अलीशेट्टी ने 'पेमेंट ऑफ़ वेजेज़ अथॉरिटी' के एक आदेश को रद्द करते हुए यह बात कही। अथॉरिटी ने पंचायत राज विभाग को एक वॉटरमैन को वेतन और मुआवज़ा देने का निर्देश दिया था।
यह विवाद पुराने मेदक ज़िले के 110 गांवों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए शुरू किए गए 'नीदरलैंड्स असिस्टेंस प्रोग्राम' से जुड़ा था। प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद, जलापूर्ति प्रणाली के रखरखाव का काम कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर सौंपा गया, जिसमें कॉन्ट्रैक्टरों को एकमुश्त भुगतान किया जाता था और वे अपने कर्मचारी खुद रखते थे।
वॉटरमैन ने दावा किया कि उसने विभाग के अधीन काम किया था और उसे राज्य की तय दरों (SSR) से कम वेतन दिया गया था। संगारेड्डी स्थित 'पेमेंट ऑफ़ वेजेज़ अथॉरिटी' ने उसका दावा स्वीकार कर लिया और उसे दावे की राशि का तीन गुना मुआवज़ा देने का आदेश दिया।
हाई कोर्ट ने कहा कि नियोक्ता-कर्मचारी का रिश्ता साबित करने की शुरुआती ज़िम्मेदारी वर्कर की है। कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई नियुक्ति आदेश, समझौता, वेतन रजिस्टर, मस्टर रोल या कोई अन्य दस्तावेज़ नहीं था जिससे यह पता चले कि विभाग ने उसे नौकरी पर रखा था।
हाई कोर्ट ने कहा कि घायल ड्राइवर को मुआवज़ा देने के लिए गाड़ी के फाइनेंसर को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।





