तेलंगाना

पटाखा दुकानों के लाइसेंस में भ्रष्टाचार का खुलासा, फायर स्टेशन पर ACB का छापा

Tulsi Rao
7 Nov 2026 2:08 PM IST
पटाखा दुकानों के लाइसेंस में भ्रष्टाचार का खुलासा, फायर स्टेशन पर ACB का छापा
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हैदराबाद। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में दीपावली से पहले पटाखों की अस्थायी दुकानों को लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का मामला सामने आया है। तेलंगाना भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने शनिवार को एलबी नगर फायर स्टेशन पर अचानक छापा मारकर दस्तावेजों और कर्मचारियों के मोबाइल फोन की जांच की। इस दौरान अधिकारियों को कई संदिग्ध वित्तीय लेन-देन और लाइसेंस आवेदनों से जुड़ी गड़बड़ियों की जानकारी मिली। जांच में सामने आया कि पटाखों की अस्थायी दुकानों के लिए निर्धारित ऑनलाइन शुल्क केवल 500 रुपये है, लेकिन कर्मचारियों के मोबाइल फोन पर 1,000 रुपये से लेकर 4,500 रुपये तक के लगभग 90 संदिग्ध यूपीआई लेन-देन मिले हैं।

एसीबी अधिकारियों के अनुसार, एलबी नगर फायर स्टेशन में पटाखों की अस्थायी दुकानों के लाइसेंस जारी करने के नाम पर निर्धारित शुल्क से अधिक रकम वसूलने की शिकायतें मिल रही थीं। इन शिकायतों के आधार पर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की टीम ने अचानक निरीक्षण किया।

छापेमारी के दौरान अधिकारियों ने लाइसेंस आवेदनों की स्थिति, शुल्क भुगतान और संबंधित कर्मचारियों के मोबाइल फोन में मौजूद लेन-देन की जानकारी की जांच की। प्रारंभिक जांच में कई अनियमितताएं सामने आने की बात कही गई है।

अधिकारियों ने बताया कि फायर स्टेशन में पटाखों की अस्थायी दुकानों के लाइसेंस के लिए लगभग 397 आवेदन प्राप्त हुए थे। इनमें से 26 आवेदन अब भी लंबित पाए गए। एसीबी ने इन आवेदनों के लंबित रहने और उनके निस्तारण में देरी के कारणों की जांच शुरू कर दी है।

जांच में सबसे महत्वपूर्ण जानकारी कर्मचारियों के मोबाइल फोन से सामने आई। एसीबी अधिकारियों को लगभग 90 संदिग्ध यूपीआई ट्रांजेक्शन मिले। ये सभी लेन-देन पिछले एक सप्ताह के भीतर किए गए बताए जा रहे हैं।

अधिकारियों के अनुसार, प्रत्येक संदिग्ध लेन-देन की रकम 1,000 रुपये से 4,500 रुपये के बीच थी। जबकि पटाखों की अस्थायी दुकान का लाइसेंस प्राप्त करने के लिए आधिकारिक ऑनलाइन शुल्क केवल 500 रुपये निर्धारित है।

निर्धारित शुल्क और मोबाइल फोन पर मिले लेन-देन की रकम में अंतर होने के कारण अधिकारियों ने इन भुगतानों की जांच शुरू की है। हालांकि, सभी संदिग्ध ट्रांजेक्शन लाइसेंस जारी करने के बदले ही किए गए थे या नहीं, इसकी अंतिम पुष्टि जांच पूरी होने के बाद होगी।

एसीबी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि संबंधित कर्मचारियों ने किन लोगों से भुगतान प्राप्त किया और इन लेन-देन का लाइसेंस आवेदन प्रक्रिया से क्या संबंध है। इसके अलावा लंबित आवेदनों के निस्तारण में देरी के पीछे भी संभावित अनियमितताओं की जांच की जा रही है।

पटाखों की अस्थायी दुकानों के लिए लाइसेंस जारी करना सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। ऐसे प्रतिष्ठानों को अनुमति देने से पहले निर्धारित नियमों और आवश्यक शर्तों का पालन किया जाना जरूरी होता है। इस प्रक्रिया में अनियमितता होने से आवेदकों को आर्थिक नुकसान पहुंचने के साथ प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी सवाल उठ सकते हैं।

एसीबी अधिकारियों ने बताया कि 397 आवेदनों में से 26 के लंबित रहने के कारणों की अलग से जांच की जा रही है। यह देखा जाएगा कि आवेदन दस्तावेजों की कमी या अन्य वैध कारणों से लंबित थे अथवा उनके निस्तारण में जानबूझकर देरी की गई।

भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने इस मामले को लेकर आम जनता और पटाखा व्यापारियों से भी सहयोग की अपील की है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि अस्थायी पटाखा दुकान के लाइसेंस के लिए निर्धारित ऑनलाइन शुल्क 500 रुपये है।

यदि कोई फायर स्टेशन कर्मचारी इस निर्धारित शुल्क से अधिक पैसे मांगता है, तो आवेदक इसकी शिकायत कर सकते हैं। इसके अलावा यदि किसी आवेदन को बिना स्पष्ट कारण, सिफारिश या अस्वीकृति के लंबे समय तक लंबित रखा जाता है, तो उसकी जानकारी भी एसीबी को दी जा सकती है।

एसीबी ने शिकायत दर्ज कराने के लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1064 जारी किया है। अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि भ्रष्टाचार या अवैध वसूली से संबंधित जानकारी मिलने पर इस नंबर पर संपर्क करें।

अधिकारियों के अनुसार, जांच का उद्देश्य लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और संभावित भ्रष्टाचार के मामलों का पता लगाना है। इसके लिए संबंधित दस्तावेजों और वित्तीय लेन-देन की पड़ताल की जा रही है।

एलबी नगर फायर स्टेशन पर हुई इस कार्रवाई के बाद पटाखा लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। फिलहाल एसीबी ने संदिग्ध लेन-देन और लंबित आवेदनों की जांच शुरू की है। उपलब्ध जानकारी में किसी कर्मचारी की गिरफ्तारी या दोष सिद्ध होने की पुष्टि नहीं की गई है।

जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि निर्धारित शुल्क से अधिक रकम किस उद्देश्य से ली गई थी और इसमें किन कर्मचारियों की भूमिका रही है।

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