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Telangana तेलंगाना: हैदराबाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा बनाए गए आर्टवर्क के कॉपीराइट को लेकर बहस तेज हो गई है। कंप्यूटर साइंटिस्ट स्टीफन थेलर ने करीब 14 साल पहले ‘ए रीसेंट एंट्रेंस टू पैराडाइज’ नाम का एक आर्टवर्क तैयार किया था, जिसे उन्होंने अपने बनाए AI सिस्टम DABUS की मदद से बनाया था।
स्टीफन थेलर ने इस आर्टवर्क के लिए कॉपीराइट प्रोटेक्शन की मांग की थी। उनकी दलील थी कि इस इमेज का निर्माण DABUS ने किया है, इसलिए मशीन को इसका “ऑथर” माना जाना चाहिए, जबकि वह स्वयं इसके मालिक (ओनर) हैं। इस तरह उन्होंने कॉपीराइट कानून के तहत एक नया दृष्टिकोण पेश करने की कोशिश की।
हालांकि, United States Copyright Office ने उनके इस आवेदन को खारिज कर दिया। कार्यालय का कहना था कि मौजूदा कॉपीराइट कानून के तहत किसी भी रचना के लिए मानव का लेखक होना अनिवार्य है। इस फैसले को बाद में अदालत में चुनौती दी गई, लेकिन कोर्ट ने भी इसी निष्कर्ष को सही ठहराया।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कॉपीराइट एक्ट के तहत केवल वही रचनाएं संरक्षित हो सकती हैं, जिनके पीछे किसी इंसान की रचनात्मक भागीदारी हो। AI सिस्टम को ऑथर के रूप में मान्यता देने का कोई प्रावधान वर्तमान कानून में नहीं है। इस निर्णय ने यह साफ कर दिया कि मशीन द्वारा बनाई गई सामग्री को कानूनी रूप से कॉपीराइट सुरक्षा नहीं दी जा सकती, जब तक कि उसमें मानव का सीधा योगदान न हो।
यह मामला तकनीक और कानून के बीच बढ़ती जटिलता को भी उजागर करता है। आज के समय में AI सिस्टम तेजी से रचनात्मक कार्य करने लगे हैं, जैसे कि चित्र बनाना, लेखन करना और संगीत तैयार करना। ऐसे में यह सवाल उठता है कि इन रचनाओं का मालिक कौन होगा और इन्हें किस तरह की कानूनी सुरक्षा मिलेगी।
स्टीफन थेलर का मामला इस बहस का एक प्रमुख उदाहरण बन गया है। उन्होंने यह तर्क दिया था कि यदि AI को एक स्वतंत्र रचनाकार के रूप में स्वीकार नहीं किया गया, तो तकनीकी प्रगति के साथ न्याय करना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, अदालत ने वर्तमान कानूनों के आधार पर ही निर्णय दिया और किसी नए दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का प्रभाव भविष्य में AI से जुड़ी रचनाओं पर पड़ सकता है। जब तक कानून में बदलाव नहीं किया जाता, तब तक AI द्वारा बनाई गई सामग्री को लेकर कॉपीराइट के दावे सीमित रहेंगे। इससे टेक्नोलॉजी और क्रिएटिव इंडस्ट्री के बीच नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
United States Copyright Office के इस रुख से यह भी संकेत मिलता है कि फिलहाल कानून पारंपरिक रचनात्मक प्रक्रिया को ही मान्यता देता है। यानी किसी भी रचना के पीछे इंसानी दिमाग और प्रयास होना जरूरी है, तभी उसे कानूनी संरक्षण मिल सकता है।
इस मामले ने वैश्विक स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है, क्योंकि कई देशों में AI और उससे जुड़े कानूनों को लेकर चर्चा जारी है। आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि क्या सरकारें और न्यायालय इस विषय पर नए नियम और दिशा-निर्देश तैयार करते हैं या नहीं।
कुल मिलाकर, स्टीफन थेलर द्वारा उठाया गया यह मामला AI और कॉपीराइट कानून के बीच के संबंध को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस का केंद्र बन गया है। अदालत के फैसले ने फिलहाल यह स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा कानून के तहत केवल मानव को ही किसी रचना का ऑथर माना जाएगा।
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