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अधिकार-आधारित गारंटी कानून के भविष्य को लेकर जताई जा रही आशंकाएं सच साबित हो रही हैं। जब NDA सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) की जगह 'विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)' (VB-G RAM G) एक्ट पेश किया, तो व्यापक चिंताएं थीं कि इससे राज्यों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और लाखों गरीब लोगों के अधिकार छिन जाएंगे। ताजा आंकड़े एक निराशाजनक तस्वीर पेश करते हैं। पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में इस साल जुलाई-अगस्त में ग्रामीण रोजगार के 9.56 करोड़ कार्य-दिवसों (workdays) का नुकसान हुआ। ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए, किसानों के संगठन 'संयुक्त किसान मोर्चा' (SKM) ने इस योजना को लेकर वाजिब सवाल उठाए हैं। इसने बताया है कि जुलाई-अगस्त की अवधि के दौरान 20.21 करोड़ व्यक्ति-दिवस (person-days) का काम हुआ, जबकि 2025 में यह आंकड़ा 29.77 करोड़ था।
ये आंकड़े केंद्र के उन दावों को गलत साबित करते हैं जिनमें कहा गया था कि नई ग्रामीण रोजगार योजना MGNREGA का ही एक बेहतर संस्करण है। जहां UPA सरकार द्वारा बनाया गया MGNREGA एक अधिकार-आधारित कानून था जो ग्रामीण परिवारों को कानूनी रूप से काम की मांग करने का हक देता था, वहीं VB-G RAM G एक केंद्रीय रूप से तैयार किए गए मिशन की ओर बढ़ता है जो संपत्ति निर्माण, डिजिटल निगरानी और प्रशासनिक प्रदर्शन पर जोर देता है। नई योजना के तहत, केंद्र सरकार खुद तय किए गए "वस्तुनिष्ठ मानदंडों" के आधार पर प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए राज्यों के हिसाब से मानक आवंटन (normative allocation) निर्धारित करेगी। आवंटन से अधिक होने वाला कोई भी खर्च राज्य सरकार को ही उठाना होगा।
काम के दिनों में भारी गिरावट को देखते हुए, केंद्र सरकार इस मामले से पल्ला नहीं झाड़ सकती। उसे इस बुनियादी सवाल पर गौर करना होगा कि क्या नई ग्रामीण रोजगार योजना मूल रूप से प्रतिबंधात्मक है। उसे गंभीरता से आत्म-मंथन करना होगा कि क्या केंद्रीय वित्त-पोषित और मांग-आधारित मॉडल से हटकर ऐसे मॉडल की ओर बढ़ना समझदारी भरा कदम था, जिसमें अब अधिकांश राज्यों को लागत का 40% हिस्सा खुद देना होगा। हालांकि बुवाई के मौसम में काम का अस्थायी रूप से रुकना, पुरानी स्कीम से नई स्कीम में बदलाव में देरी और मज़दूरों का कम पलायन जैसे कारण इसमें भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन अकेले ये कारण रोज़गार पैदा करने में आई इतनी बड़ी गिरावट को नहीं समझा सकते। जानकारों का कहना है कि यहाँ कुछ बुनियादी गड़बड़ है।
यह तर्क कि बढ़ती अर्थव्यवस्था में ग्रामीण बेरोज़गारी से निपटने के लिए रोज़गार की गारंटी की ज़रूरत नहीं है, गलत है। यह स्कीम लाखों भारतीयों के लिए जीवन रेखा है। लागू करने में कुछ कमियों के बावजूद, पुरानी स्कीम ग्रामीण गरीबों के लिए उम्मीद की किरण थी। रोज़गार की गारंटी के लिए कानूनी ढांचा इसलिए बनाया गया था ताकि उन्हें सरकार की मर्ज़ी पर निर्भर रहने से आज़ादी मिल सके। अगर यह पूरी तरह से बजट पर निर्भर होगी, तो इसमें कमियां ज़रूर आएंगी। ऐसी स्थिति में, एक मज़बूत निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही के नियम ज़रूरी हैं। सरकार का तर्क है कि नई स्कीम से कार्यक्षमता और उत्पादकता में सुधार होगा, लेकिन आलोचकों का कहना है कि कानूनी रूप से लागू होने वाली गारंटी की जगह धीरे-धीरे एक ऐसे कार्यक्रम को दी जा रही है जिसकी सफलता प्रशासनिक अधिकारियों की मर्ज़ी पर निर्भर करती है।
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