
हैदराबाद: तेलंगाना बीजेपी के मुख्य प्रवक्ता एन.वी. सुभाष ने शुक्रवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी की आलोचना की। यह प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा कांग्रेस पार्टी, राहुल गांधी और 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के अन्य नेताओं को एक याचिका के संबंध में नोटिस जारी करने के बाद आई है। इस याचिका में 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक उनके मार्च और याचिका दाखिल करने के लिए कोर्ट रजिस्ट्री में उनके प्रवेश को लेकर चिंता जताई गई थी।
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए, सुभाष ने कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता को जिम्मेदारी से काम करना चाहिए और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी के कार्यों से भ्रम की स्थिति पैदा हुई है और उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं के प्रति कांग्रेस नेता के रवैये पर सवाल उठाए। सुभाष ने कहा, "यह एक ऐसी स्थिति है जहां विपक्ष के नेता को, एक जिम्मेदार नेता के रूप में, इस तरह से व्यवहार करना चाहिए जिससे लोकतंत्र की रक्षा हो सके।"
उन्होंने आगे राहुल गांधी पर विभिन्न संस्थाओं और प्राधिकरणों को बार-बार निशाना बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता ने कई मौकों पर नरेंद्र मोदी सरकार को दोषी ठहराया, फिर भारत निर्वाचन आयोग पर आरोप लगाए, और अब वे न्यायपालिका पर सवाल उठा रहे हैं। सुभाष ने कहा, "कभी वे मोदी सरकार को दोष देते हैं, कभी भारत निर्वाचन आयोग को, और अब उन्होंने न्यायपालिका को दोष देना शुरू कर दिया है।"
तेलंगाना बीजेपी प्रवक्ता ने यह भी आरोप लगाया कि 12 अक्टूबर की घटना से दिल्ली में अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हो गई थी। उन्होंने राहुल गांधी पर इस मुद्दे का इस्तेमाल मीडिया का ध्यान खींचने के लिए करने का आरोप लगाया। उन्होंने कांग्रेस नेता से अपने कार्यों के लिए स्पष्टीकरण देने और देश से माफी मांगने को कहा।
सुभाष ने आगे दावा किया कि राहुल गांधी चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) और न्यायपालिका को लेकर एक "झूठा नैरेटिव" (गलत धारणा) बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस इन मुद्दों को इसलिए उठा रही है ताकि दोष संवैधानिक संस्थाओं पर मढ़ा जा सके। ये टिप्पणियां 12 अक्टूबर को 'इंडिया' गठबंधन के नेताओं के कार्यों से जुड़े कानूनी और राजनीतिक विवाद के बीच आई हैं। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस में याचिका में नामित पार्टियों और नेताओं से इस घटना के संबंध में जवाब मांगा गया है। इस मामले ने राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों, चुनावी प्रक्रियाओं और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर चल रही बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है।





