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Hyderabad हैदराबाद। पशु संरक्षण संगठन ह्यूमन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया ने सोमवार को नागरिकों से अपील की कि वे मकर संक्रांति के दौरान होने वाली मुर्गों की लड़ाई में हिस्सा न लें। यह जानवरों के प्रति क्रूरता का एक गैर-कानूनी रूप है। संगठन ने लोगों से यह भी कहा कि अगर वे मुर्गों की लड़ाई के किसी भी मामले के बारे में जानकारी रखते हैं तो उसे स्थानीय पुलिस अधिकारियों को दें। मुर्गों की लड़ाई में दो मुर्गों को, जिनके पंजों पर अक्सर रेजर ब्लेड लगाए जाते हैं, एक-दूसरे से तब तक लड़ने के लिए मजबूर किया जाता है जब तक कि उनमें से एक की मौत न हो जाए। यह लड़ाई आमतौर पर एक या दोनों मुर्गों की मौत के साथ खत्म होती है।
आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और ओडिशा के कुछ हिस्सों में अभी भी प्रचलित मुर्गों की लड़ाई कानून के तहत अपराध है और इसके लिए सजा का प्रावधान है। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के सेक्शन 11(1)(एम)(ii) के तहत जानवरों की लड़ाई करवाना गैर-कानूनी है। ऐसी लड़ाइयों को आयोजित करना, उनका प्रबंधन करना या उनके लिए जगह देना भी सेक्शन 11(1)(एन) के तहत अपराध है। इसके अलावा, मुर्गों की लड़ाई के कार्यक्रम अक्सर अवैध जुआ, गैर-कानूनी शराब की बिक्री और बाल श्रम से जुड़े होते हैं, जो सभी प्रतिबंधित हैं।
ह्यूमन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया की क्रूरता प्रतिक्रिया विशेषज्ञ मिशी अग्रवाल ने सोमवार को कहा, "यह डरावना है कि ऐसा अभी भी होता है, और कोई त्योहार या उत्सव इसे सही नहीं ठहरा सकता। मैंने मुर्गों की आंखों में डर और उनकी हरकतों में बेचैनी देखी है। वे डर के मारे कांप रहे हैं, क्योंकि उन्हें एक-दूसरे का सामना करने के लिए मजबूर किया जाता है। कुछ मुर्गों से पिछले झगड़ों में खून बहा है, फिर भी उन्हें लड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। वे पूरी तरह खून से लथपथ हैं और अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
उन्होंने आगे कहा, "यह मनोरंजन नहीं है। यह जानबूझकर की गई क्रूरता है, जो जुए और मजे के लिए की जाती है। हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह इसकी रिपोर्ट करे, इसमें हिस्सा लेने से मना करे और इसमें शामिल किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी स्थानीय अधिकारियों को दे। ह्यूमन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया की लीगल कंसल्टेंट श्रेया परोपकारी ने कहा कि मुर्गों की लड़ाई हिंसा और शोषण का एक संगठित चक्र बढ़ाती है। इस हिंसक प्रथा का एक अहम हिस्सा जुआ और सट्टेबाजी है, जो अक्सर किसानों और मजदूरों की सालाना आमदनी खत्म कर देती है। इससे परिवार कर्ज में फंस जाते हैं और महिलाओं को इसका सबसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है।
इन गैर-कानूनी अखाड़ों में बच्चों को शराब बेचने या पहुंचाने और घायल पक्षियों को पकड़कर मारने का काम कराया जाता है। इससे कम उम्र में ही क्रूरता सामान्य लगने लगती है। यह संगठन एक दशक से ज्यादा समय से पुलिस और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर मुर्गों की लड़ाई की क्रूर प्रथा खत्म करने के लिए काम कर रहा है और इसके बारे में जागरूकता फैला रहा है। 2016 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने मुर्गों की लड़ाई पर बैन को दोहराया और कहा कि ये इवेंट हिंसा को बढ़ावा देते हैं। इसमें मुर्गों को चाकू से एक-दूसरे को काटने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे बहुत खून बहता है और गंभीर चोटें आती हैं। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यह इवेंट खुद पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत गैर-कानूनी है और यह लोगों को जानवरों के दर्द और पीड़ा के प्रति असंवेदनशील बनाता है।
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