
Tamil Nadu तमिलनाडु: टाइप-1 डायबिटीज़ से पीड़ित बच्चों के उपचार को लेकर एक नई शोध में उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। अध्ययन में दावा किया गया है कि पारंपरिक चिकित्सा के साथ नेचुरोपैथिक टच थेरेपी (Naturopathic Touch Therapy) को सहायक उपचार के रूप में अपनाने पर बच्चों के ब्लड शुगर स्तर को नियंत्रित करने में सकारात्मक प्रभाव देखा गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह पद्धति मुख्य उपचार का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक चिकित्सा के रूप में उपयोगी हो सकती है।
यह अध्ययन योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा (योगा एंड नेचुरोपैथी) क्षेत्र के विशेषज्ञों की एक शोध टीम ने किया। इस टीम में डॉ. शोभना देवी, मूवेंधन, एडमिन क्रिस्टा, लता, मंगैयारकरासी, हेमचित्रा, थांथोली, एझिलारसी और एन. मनावलन शामिल रहे। अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर एक शोध पत्र भी प्रकाशित किया गया है, जिसमें उपचार के दौरान प्राप्त परिणामों का विस्तार से उल्लेख किया गया है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज़ के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। यह ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) अग्न्याशय (पैंक्रियास) की उन कोशिकाओं पर हमला कर देती है, जो इंसुलिन का निर्माण करती हैं। परिणामस्वरूप शरीर में इंसुलिन बनना बंद या बहुत कम हो जाता है और रोगी को जीवनभर इंसुलिन इंजेक्शन पर निर्भर रहना पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, टाइप-1 डायबिटीज़ और टाइप-2 डायबिटीज़ में महत्वपूर्ण अंतर होता है। टाइप-1 डायबिटीज़ मुख्य रूप से ऑटोइम्यून कारणों से होती है और इसमें इंसुलिन थेरेपी अनिवार्य होती है। इसलिए इस बीमारी का इलाज केवल वैकल्पिक चिकित्सा से संभव नहीं है। हालांकि, जीवनशैली में सुधार और सहायक उपचार रोग प्रबंधन में मददगार साबित हो सकते हैं।
इसी उद्देश्य से शोधकर्ताओं ने चेन्नई के एग्मोर सरकारी बाल चिकित्सालय में इलाज करा रहे 50 बच्चों पर अध्ययन किया। इनमें 18 लड़के और 32 लड़कियां शामिल थीं। अध्ययन में शामिल बच्चों की औसत आयु लगभग 9 वर्ष थी। सभी बच्चों का नियमित चिकित्सा उपचार पहले से जारी था और उन्हें चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया।
शोध के दौरान बच्चों को नियमित इंसुलिन उपचार के साथ निर्धारित अवधि तक नेचुरोपैथिक टच थेरेपी भी दी गई। इस थेरेपी का उद्देश्य शरीर को आराम पहुंचाना, तनाव कम करना और समग्र स्वास्थ्य में सुधार लाना था। अध्ययन के दौरान समय-समय पर बच्चों के ब्लड शुगर स्तर की जांच की गई और उपचार से पहले तथा बाद के परिणामों की तुलना की गई।
शोधकर्ताओं के अनुसार, अध्ययन में शामिल बच्चों के ब्लड शुगर स्तर में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले। कई बच्चों में ग्लूकोज नियंत्रण पहले की तुलना में बेहतर पाया गया। इसके साथ ही कुछ बच्चों में तनाव और मानसिक बेचैनी में भी कमी दर्ज की गई, जिससे उनके समग्र स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
हालांकि शोध टीम ने स्पष्ट किया कि नेचुरोपैथिक टच थेरेपी को इंसुलिन इंजेक्शन का विकल्प नहीं माना जा सकता। टाइप-1 डायबिटीज़ के मरीजों के लिए नियमित इंसुलिन लेना और चिकित्सकीय सलाह का पालन करना अनिवार्य है। यह थेरेपी केवल सहायक उपचार (Complementary Therapy) के रूप में अपनाई जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि टाइप-1 डायबिटीज़ से पीड़ित बच्चों के उपचार में केवल दवा ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, तनाव प्रबंधन, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और परिवार का सहयोग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इन सभी पहलुओं पर एक साथ ध्यान दिया जाए तो बच्चों के जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाई जा सकती है।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि इस विषय पर भविष्य में अधिक बड़े स्तर पर और लंबी अवधि के अध्ययन किए जाने चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि नेचुरोपैथिक टच थेरेपी का दीर्घकालिक प्रभाव कितना प्रभावी और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है। विभिन्न आयु वर्गों और अलग-अलग परिस्थितियों में भी इसके परिणामों का मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि वैकल्पिक और पूरक चिकित्सा पद्धतियों पर वैज्ञानिक शोध बढ़ने से रोगियों को बेहतर उपचार विकल्प मिल सकते हैं। हालांकि किसी भी नई चिकित्सा पद्धति को अपनाने से पहले विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह लेना आवश्यक है, विशेषकर टाइप-1 डायबिटीज़ जैसी गंभीर और आजीवन उपचार वाली बीमारी में।
यह अध्ययन बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज़ प्रबंधन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। यदि भविष्य के व्यापक शोध भी इसी प्रकार के सकारात्मक परिणामों की पुष्टि करते हैं, तो नेचुरोपैथिक टच थेरेपी को पारंपरिक चिकित्सा के साथ एक सहायक उपचार के रूप में अधिक व्यापक स्तर पर अपनाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। हालांकि फिलहाल विशेषज्ञ यही सलाह दे रहे हैं कि मरीज अपने नियमित उपचार, इंसुलिन थेरेपी और डॉक्टर की सलाह में किसी प्रकार का बदलाव स्वयं न करें।





