
Tamil Nadu तमिलनाडु: चेन्नई हाई कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में पूर्व मंत्री गीता जीवन और उनके परिवार को बरी किए जाने के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने याचिका दाखिल करने में हुई 839 दिन की देरी को आधार मानते हुए इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया और मामले को समाप्त कर दिया।
यह मामला तमिलनाडु में वर्ष 1996 से 2001 के बीच DMK सरकार के कार्यकाल से जुड़ा हुआ है। उस समय थूथुकुडी जिले के DMK सचिव और पूर्व विधायक N. Periyasamy के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति जमा करने का आरोप लगा था। जांच के अनुसार उन पर लगभग 2.31 करोड़ रुपये की अवैध संपत्ति अर्जित करने का मामला दर्ज किया गया था।
इस मामले में एन. पेरियासामी के साथ उनकी पत्नी एबेनेसारम्मल, बेटे राजा और जगन, बेटी तथा पूर्व मंत्री गीता जीवन और उनके पति जैकब राजेंद्रन को भी आरोपी बनाया गया था। सभी आरोपियों पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाया गया था और मामले की विस्तृत जांच की गई थी।
सुनवाई के दौरान वर्ष मई 2017 में N. Periyasamy का निधन हो गया। इसके बाद बाकी आरोपियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया जारी रही। मामले की सुनवाई थूथुकुडी कोर्ट में हुई और वर्ष 2022 में अदालत ने सभी आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि आरोप साबित नहीं हो पाए हैं।
इस फैसले के खिलाफ थूथुकुडी के एक मतदाता शनमुगासुंदरम ने मद्रास हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी। याचिका में मांग की गई थी कि पूर्व मंत्री गीता जीवन और उनके परिवार को बरी किए जाने के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका को स्वीकार किया जाए और उसे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए। याचिकाकर्ता ने यह भी आग्रह किया था कि मामले की पुनः समीक्षा की जाए।
यह याचिका 839 दिन की देरी से दायर की गई थी, जिस पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई। गुरुवार को इस मामले की सुनवाई जस्टिस जी.के. इलांधिरियन के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने देरी के कारणों को पर्याप्त नहीं माना और स्पष्ट किया कि इतने लंबे विलंब को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रक्रिया के अनुसार इतने लंबे समय बाद दायर की गई याचिका को स्वीकार करना उचित नहीं होगा। इसी आधार पर अदालत ने पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया और मामले को समाप्त कर दिया।
इस फैसले के बाद पूर्व मंत्री गीता जीवन और उनके परिवार को कानूनी राहत मिली है, क्योंकि अब इस मामले में पुनः सुनवाई की संभावना समाप्त हो गई है। अदालत के इस निर्णय के बाद यह मामला लंबे समय से चली आ रही कानूनी प्रक्रिया के अंत के रूप में देखा जा रहा है।
मामले से जुड़े अधिकारियों और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत का यह निर्णय प्रक्रिया और समय-सीमा के पालन को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी को बिना ठोस कारण स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इस पूरे प्रकरण ने तमिलनाडु की राजनीति में भी चर्चा पैदा की थी, क्योंकि इसमें एक पूर्व मंत्री और उनके परिवार का नाम जुड़ा हुआ था। हालांकि अदालत के अंतिम निर्णय के बाद अब यह मामला कानूनी रूप से समाप्त हो चुका है।





