तमिलनाडू

सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्णय आरक्षण दावे में मां की जाति भी होगी मान्य

Ratna Netam
1 Sept 2026 9:07 PM IST
सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्णय आरक्षण दावे में मां की जाति भी होगी मान्य
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चेन्नई : सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की जाति पहचान केवल पिता की जाति से तय नहीं होती। कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति अपनी **मां की जाति और उसके सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर भी आरक्षण का दावा कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने लंबे समय से चली आ रही उस धारणा को चुनौती दी है जिसमें माना जाता था कि संतान की जाति हमेशा पिता के आधार पर ही तय होगी। अदालत ने कहा कि जाति का निर्धारण व्यक्ति के सामाजिक अनुभव, पारिवारिक परिस्थितियों और समाज में उसकी स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
पिता की जाति ही अंतिम आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति की जाति पहचान तय करने में केवल पिता की जाति को ही अंतिम आधार नहीं माना जा सकता। अगर किसी व्यक्ति का पालन-पोषण मां की जाति और उसी सामाजिक समुदाय के वातावरण में हुआ है, तो वह मां की जाति के आधार पर भी दावा कर सकता है।
अदालत ने कहा कि संविधान में दिए गए आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को अवसर देना है। इसलिए किसी व्यक्ति की वास्तविक सामाजिक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मां की जाति के आधार पर दावा संभव
फैसले में यह साफ किया गया कि अगर कोई व्यक्ति अपनी मां की जाति से जुड़े समुदाय में पला-बढ़ा है और उसने उसी समुदाय के सामाजिक भेदभाव या पिछड़ेपन का सामना किया है, तो उसके दावे पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि, सिर्फ मां की जाति बताना ही पर्याप्त नहीं होगा। व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि वह वास्तव में उसी सामाजिक वातावरण में रहा है और संबंधित समुदाय की परिस्थितियों का अनुभव किया है।
सामाजिक स्थिति होगी अहम
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का मकसद केवल जाति प्रमाण पत्र देना नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करना है। इसलिए किसी भी दावे पर फैसला करते समय व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और जीवन के अनुभवों को ध्यान में रखना जरूरी है।
अदालत ने माना कि कई मामलों में माता-पिता की अलग-अलग जातियां हो सकती हैं। ऐसे में बच्चे की पहचान केवल एक अभिभावक के आधार पर तय करना हमेशा उचित नहीं होगा।
अलग-अलग परिस्थितियों में अलग हो सकता है फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर मामले में मां की जाति के आधार पर आरक्षण का अधिकार अपने आप नहीं मिल जाएगा। संबंधित व्यक्ति को अपनी सामाजिक पहचान और समुदाय से जुड़े संबंध साबित करने होंगे।
यदि कोई व्यक्ति सिर्फ आरक्षण का लाभ लेने के लिए मां की जाति का दावा करता है, लेकिन उसका पालन-पोषण अलग सामाजिक परिस्थितियों में हुआ है, तो उसका दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
जाति प्रमाण पत्र की प्रक्रिया पर असर
इस फैसले के बाद जाति प्रमाण पत्र जारी करने वाली एजेंसियों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश माना जा रहा है। अब ऐसे मामलों में केवल पिता की जाति देखकर निर्णय नहीं लिया जा सकेगा।
प्रशासन को व्यक्ति के पारिवारिक इतिहास, निवास, सामाजिक वातावरण और अन्य जरूरी तथ्यों की जांच करनी होगी।
महिलाओं के अधिकारों से भी जुड़ा मामला
यह फैसला महिलाओं की सामाजिक पहचान को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से कई मामलों में महिलाओं की जाति पहचान और उनके बच्चों के अधिकारों को लेकर कानूनी विवाद सामने आते रहे हैं।
अदालत के इस रुख से यह संदेश गया है कि मां की सामाजिक पहचान को भी कानूनी रूप से महत्व दिया जा सकता है।
आरक्षण व्यवस्था में नई बहस
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद आरक्षण व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जहां माता-पिता की जातियां अलग-अलग हैं।
हालांकि, आरक्षण का लाभ देने के लिए सामाजिक पिछड़ेपन की वास्तविक स्थिति की जांच सबसे जरूरी रहेगी।
संविधान के उद्देश्य पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान की मूल भावना पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य उन लोगों को अवसर देना है जो सामाजिक असमानता और भेदभाव का सामना करते रहे हैं।
इसलिए किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान का आकलन वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए।
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