
चेन्नई। तमिलनाडु में भाषा नीति को लेकर राजनीतिक बहस के बीच मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने राज्य के ऐतिहासिक रुख को दोहराते हुए तमिल और अंग्रेजी को प्राथमिकता देने की नीति का समर्थन किया। एक शादी समारोह में संबोधित करते हुए स्टालिन ने दिवंगत मुख्यमंत्री सी.एन. अन्नादुरई की विरासत का उल्लेख किया और कहा कि राज्य की भाषा संबंधी नीति किसी तात्कालिक राजनीतिक निर्णय का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन से निकला ऐतिहासिक जनादेश है।
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन के दौरान तमिलनाडु के भाषा आंदोलन के इतिहास की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि राज्य ने लंबे समय से अपनी भाषाई पहचान और अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता दी है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में तमिल और अंग्रेजी को महत्व देने वाली दो-भाषा नीति को राज्य में लागू किया गया। स्टालिन ने अन्नादुरई की राजनीतिक विरासत का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि तमिलनाडु की भाषा नीति के पीछे क्षेत्रीय अस्मिता, मातृभाषा के प्रति सम्मान और व्यावहारिक जरूरतों का संतुलन रहा है।
तमिलनाडु की भाषा नीति देश के अन्य राज्यों की तुलना में लंबे समय से अलग पहचान रखती है। राज्य में तमिल को प्राथमिक भाषा के रूप में महत्व दिया जाता है, जबकि अंग्रेजी को शिक्षा, रोजगार, उच्च अध्ययन और व्यापक संचार की जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। मुख्यमंत्री के बयान को इसी नीति के समर्थन के तौर पर देखा जा रहा है। स्टालिन ने अन्नादुरई के विचारों और उनके कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि भाषा के सवाल पर तमिलनाडु ने जो रास्ता चुना, उसके पीछे एक लंबा ऐतिहासिक संघर्ष रहा है।
सी.एन. अन्नादुरई तमिलनाडु की राजनीति में एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व रहे हैं। उन्होंने द्रविड़ आंदोलन की राजनीतिक धारा को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई और बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। उनकी राजनीति में तमिल भाषा, सामाजिक न्याय और राज्य के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुख स्थान मिला। स्टालिन द्वारा अन्नादुरई की विरासत का उल्लेख करना इसी राजनीतिक और वैचारिक परंपरा को रेखांकित करने के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने भाषा के मुद्दे को केवल शिक्षा या प्रशासन तक सीमित विषय नहीं माना, बल्कि इसे तमिलनाडु की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से भी जोड़कर देखा। उनका संदेश यह रहा कि भाषा के संबंध में राज्य का रुख अचानक तय नहीं हुआ है। इसके पीछे दशकों से चले आ रहे आंदोलन, राजनीतिक बहस और जनता की भावनाएं जुड़ी हुई हैं।
तमिलनाडु में दो-भाषा नीति को लेकर समय-समय पर राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा होती रही है। केंद्र और विभिन्न राज्यों में तीन-भाषा नीति तथा हिंदी के अध्ययन को लेकर अलग-अलग विचार सामने आते रहे हैं। ऐसे समय में तमिलनाडु सरकार लगातार यह रुख रखती रही है कि राज्य की शिक्षा और भाषा व्यवस्था में तमिल तथा अंग्रेजी को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए। स्टालिन के ताजा बयान को भी इसी व्यापक बहस की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।





