
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अभिव्यक्ति की आज़ादी और विधायी विशेषाधिकारों (legislative privileges) से जुड़े मामले पर सात जजों की संविधान पीठ के रेफरेंस को "बेअसर" (infructuous) बताते हुए बंद कर दिया। कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु विधानसभा में 2003 में पास किया गया प्रस्ताव, जो इस मामले की वजह बना था, उसे 2004 में ही वापस ले लिया गया था।
इस बेंच में जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस अरविंद कुमार, पी के मिश्रा, जॉयमाल्य बागची, विपुल पंचोली, श्री चंद्रशेखर और वी मोहना शामिल थे। बेंच ने माना कि रेफरेंस ऑर्डर पास करते समय कोर्ट का ध्यान इस बात पर नहीं गया था कि संबंधित प्रस्ताव वापस ले लिया गया था। हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि कानून से जुड़े सवाल खुले रखे गए हैं ताकि अगर भविष्य में ऐसा कोई विवाद फिर से उठता है, तो उचित मामले में उन पर फैसला किया जा सके।
यह मामला 2003 में तमिलनाडु विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर के. कालीमुथु द्वारा पास किए गए उस प्रस्ताव से जुड़ा है, जिसमें एन. रवि समेत छह पत्रकारों की गिरफ्तारी का आदेश दिया गया था। स्पीकर का कहना था कि अखबार में छपे एक संपादकीय से सदन के विशेषाधिकारों का उल्लंघन हुआ है।





