
Tamil Nadu तमिलनाडु: सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया है, जिसमें उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई थी, जिन्होंने रमजान के महीने में धार्मिक समारोह की इजाजत देने के बाद, थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर हिंदू भक्तों को दीये जलाने की अनुमति नहीं दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस श्री चंद्रशेखर शामिल थे, ने मदुरै बेंच के हाई कोर्ट के आदेश पर टिप्पणी की कि वे हाई कोर्ट के निर्णय में दखल नहीं देना चाहते। हालांकि, बेंच ने याचिकाकर्ता हिंदू धर्म परिषद पर लगाए गए जुर्माने की राशि को लेकर कहा कि 50,000 रुपये का जुर्माना इस मामले के तथ्यों और हालात को देखते हुए अत्यधिक है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जुर्माने की राशि को घटाकर 5,000 रुपये किया जा सकता है। अदालत ने 2 जून को यह आदेश जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट के आदेश में दखल नहीं देना उनका उद्देश्य है, लेकिन जुर्माने की अधिकता को देखते हुए इसे घटाना न्यायसंगत माना गया।
मामला थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर धार्मिक समारोहों को लेकर उठे विवाद से जुड़ा है। रमजान के महीने में संबंधित अधिकारियों ने धार्मिक समारोह की अनुमति दी थी, लेकिन हिंदू भक्तों को दीये जलाने की इजाजत नहीं दी गई। इसके खिलाफ याचिका दायर की गई थी, जिसमें अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी। मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने इस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालत हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती, लेकिन जुर्माने की राशि को घटाना न्याय और परिस्थितियों के अनुसार उचित है। कोर्ट ने यह निर्णय इस आधार पर लिया कि 50,000 रुपये का जुर्माना याचिकाकर्ता पर अत्यधिक भार डालता है और मामले के तथ्यों के अनुरूप नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न्यायसंगत और संतुलित माना जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि धार्मिक स्थल और त्योहारों से जुड़े मामलों में प्रशासनिक निर्णयों में उच्चतम न्यायालय का दखल केवल उचित मामलों में ही होगा। जुर्माने की राशि को घटाकर 5,000 रुपये करना इस दृष्टिकोण का हिस्सा है।
इस फैसले से यह भी संदेश जाता है कि अदालत प्रशासनिक निर्णयों और धार्मिक विवादों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय के आदेश का सम्मान किया जाएगा, लेकिन मामले में जुर्माने की राशि को घटाकर न्यायसंगत बनाने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास है।
समग्र रूप से देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए जुर्माने की राशि में संशोधन किया है। इससे याचिकाकर्ता और प्रशासन दोनों के हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित और न्यायसंगत समाधान प्राप्त हुआ है।





