
चेन्नई। तमिलनाडु में आवारा और पालतू कुत्तों के काटने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है। राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग (पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 में अब तक 4.68 लाख से अधिक लोग कुत्तों के काटने का शिकार हो चुके हैं। इनमें से 24 लोगों की रेबीज संक्रमण के कारण मौत हो गई है। इन आंकड़ों ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों और प्रशासन दोनों की चिंता बढ़ा दी है।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, रेबीज एक अत्यंत घातक वायरल बीमारी है, जो संक्रमित जानवर, विशेष रूप से कुत्ते के काटने या खरोंचने से फैलती है। यदि समय पर एंटी-रेबीज वैक्सीन और आवश्यक उपचार नहीं लिया जाए, तो यह संक्रमण लगभग हमेशा जानलेवा साबित होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि रेबीज से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय समय पर टीकाकरण और कुत्ते के काटने के तुरंत बाद चिकित्सकीय उपचार कराना है।
राज्य में बढ़ती घटनाओं का मुख्य कारण आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और पालतू कुत्तों का नियमित टीकाकरण न होना माना जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि केवल इंसानों का ही नहीं, बल्कि पालतू जानवरों का भी समय-समय पर टीकाकरण आवश्यक है। पशु चिकित्सकों के अनुसार, कुत्तों को उनके जीवन के पहले वर्ष में दो बार रेबीज का टीका लगाया जाना चाहिए और इसके बाद प्रत्येक वर्ष एक बार बूस्टर डोज देना अनिवार्य है। इससे न केवल जानवर सुरक्षित रहते हैं, बल्कि इंसानों में संक्रमण फैलने का खतरा भी काफी कम हो जाता है।
हालांकि, वास्तविक स्थिति यह है कि राज्य के कई इलाकों में आवारा कुत्तों का टीकाकरण नियमित रूप से नहीं हो पाता। वहीं, कुछ पालतू कुत्तों के मालिक भी समय पर टीकाकरण नहीं करवाते। परिणामस्वरूप यदि संक्रमित कुत्ता किसी व्यक्ति को काट लेता है, तो रेबीज का संक्रमण फैलने की आशंका बढ़ जाती है। यही कारण है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग एंटी-रेबीज उपचार के लिए सरकारी और निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं।
पिछले वर्ष के आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। वर्ष 2025 में पूरे तमिलनाडु में 6 लाख 25 हजार 700 लोगों को कुत्तों ने काटा था। इनमें से 34 लोगों की रेबीज के कारण मृत्यु हुई थी। हालांकि इस वर्ष अब तक दर्ज मामलों की संख्या पिछले वर्ष की कुल संख्या से कम है, लेकिन वर्ष अभी पूरा नहीं हुआ है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को आशंका है कि यदि रोकथाम के प्रभावी उपाय नहीं किए गए तो मामलों में और वृद्धि हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कुत्ते के काटने के बाद लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। सबसे पहले घाव को कम से कम 15 मिनट तक साबुन और साफ पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। इसके बाद तुरंत नजदीकी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र पहुंचकर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। डॉक्टर की सलाह के अनुसार एंटी-रेबीज वैक्सीन और आवश्यकता पड़ने पर रेबीज इम्यूनोग्लोब्युलिन (RIG) लगवाना संक्रमण से बचाव के लिए बेहद जरूरी होता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से अपील की है कि वे आवारा कुत्तों से सावधानी बरतें और बच्चों को अकेले उनके पास जाने से रोकें। साथ ही पालतू कुत्तों के मालिकों से समय पर टीकाकरण कराने और पशु चिकित्सकों के निर्देशों का पालन करने की भी अपील की गई है। विभाग का मानना है कि जनजागरूकता बढ़ाकर और नियमित टीकाकरण अभियान चलाकर रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय निकायों को भी आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने, उनका टीकाकरण कराने और नसबंदी कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करने की दिशा में लगातार काम करना होगा। इसके अलावा स्कूलों, ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी बस्तियों में जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को रेबीज से बचाव के उपायों की जानकारी देना भी आवश्यक है।
तमिलनाडु सरकार पहले से ही विभिन्न सरकारी अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन उपलब्ध करा रही है, ताकि कुत्तों के काटने के मामलों में तुरंत उपचार दिया जा सके। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि केवल इलाज ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि रोकथाम पर विशेष ध्यान देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
राज्य में इस वर्ष अब तक 4.68 लाख लोगों के कुत्तों के काटने का शिकार होने और 24 लोगों की रेबीज से मौत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस समस्या से निपटने के लिए सरकार, स्थानीय प्रशासन, पशुपालन विभाग और आम नागरिकों को मिलकर काम करना होगा। समय पर टीकाकरण, जागरूकता और त्वरित उपचार के माध्यम से ही रेबीज जैसी घातक बीमारी से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है।





