
चेन्नई। भारत के छोटे पैमाने पर मछली पकड़ने वाले समुदायों पर जलवायु परिवर्तन का असर लगातार बढ़ रहा है। एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि समुद्र के बदलते हालात, बढ़ता तापमान, अनिश्चित मॉनसून, तेज तूफान और मछलियों की उपलब्धता में बदलाव से छोटे मछुआरों की आजीविका पर गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।
'छोटे पैमाने की मछली पकड़ने वाली गतिविधियों के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय कार्य योजना' (NPOA-SSF) के तहत तैयार की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि जलवायु से जुड़े जोखिम अब पहले की तुलना में अधिक जटिल और अनिश्चित होते जा रहे हैं।
यह रिपोर्ट बे ऑफ बंगाल प्रोग्राम इंटर-गवर्नमेंटल ऑर्गनाइजेशन (BOBP-IGO) ने राष्ट्रीय विशेषज्ञों और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की तकनीकी सहायता से तैयार की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि छोटे मछुआरों के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती बन चुका है और इससे निपटने के लिए पहले से मजबूत नीतियां तैयार करने की जरूरत है।
तापमान और मौसम में बदलाव का असर
रिपोर्ट के अनुसार, मछुआरा समुदायों ने समुद्री तापमान बढ़ने, मॉनसून के समय में बदलाव, लगातार आने वाले चक्रवात, तेज समुद्री लहरों और मछलियों की प्रजातियों में बदलाव जैसी समस्याओं को महसूस किया है।
कई क्षेत्रों के मछुआरों ने बताया कि बदलते मौसम के कारण समुद्र में जाने के सुरक्षित दिन कम हो रहे हैं। इससे मछली पकड़ने के दिनों में कमी आ रही है और उनकी आमदनी प्रभावित हो रही है।
इसके अलावा सार्डिन जैसी महत्वपूर्ण मछली प्रजातियों की उपलब्धता में गिरावट भी मछुआरों के लिए चिंता का विषय बन गई है।
आपदा से निपटने के लिए बेहतर तैयारी की जरूरत
रिपोर्ट में जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए कई उपाय सुझाए गए हैं। इसमें मजबूत और सुरक्षित नावों की उपलब्धता, मौसम की सटीक जानकारी, आपदा प्रबंधन के लिए बेहतर व्यवस्था, समय पर आर्थिक सहायता और मछुआरों के कौशल विकास पर जोर दिया गया है।
इसके साथ ही मछुआरा समुदायों के लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर विकसित करने की जरूरत भी बताई गई है, ताकि आपदा या खराब मौसम के समय उनकी आय प्रभावित न हो।
आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां भी बड़ी
रिपोर्ट में सिर्फ जलवायु जोखिमों का ही नहीं, बल्कि मछुआरों की अन्य समस्याओं का भी जिक्र किया गया है। इनमें बाजार तक सीमित पहुंच, मछली भंडारण की कमी, प्रोसेसिंग सुविधाओं का अभाव, सुरक्षा संबंधी परेशानियां और सरकारी योजनाओं में सीमित भागीदारी शामिल हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मछुआरों और महिलाओं की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ाना भी जरूरी है, ताकि योजनाएं जमीनी जरूरतों के अनुसार तैयार की जा सकें।
जलवायु जोखिम से निपटने पर जोर
BOBP-IGO के निदेशक डॉ. पी. कृष्णन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर हर जगह एक जैसा नहीं होता। इसका प्रभाव मछली पकड़ने के तरीके, उपलब्ध संसाधनों, आर्थिक स्थिति, बुनियादी सुविधाओं और आपदा के बाद वापस खड़े होने की क्षमता पर निर्भर करता है।
उन्होंने कहा कि छोटे मछुआरों को जलवायु बदलाव के प्रभावों से बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर मजबूत योजनाएं बनानी होंगी।
राष्ट्रीय कार्य योजना की तैयारी जारी
NPOA-SSF प्रक्रिया का शुरुआती चरण पूरा हो चुका है और भारत अब इसके विकास चरण में पहुंच चुका है। उम्मीद है कि राष्ट्रीय कार्य योजना का ड्राफ्ट इस साल 21 नवंबर तक तैयार कर लिया जाएगा।
सरकार और विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना छोटे मछुआरा समुदायों को जलवायु जोखिमों से बचाने, उनकी आजीविका सुरक्षित करने और मत्स्य क्षेत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।





