तमिलनाडू

परिसीमन पर तमिलनाडु में सियासी घमासान, CM विजय की सांसदों के साथ बैठक आज

Kavita2
8 Aug 2026 11:23 AM IST
परिसीमन पर तमिलनाडु में सियासी घमासान, CM विजय की सांसदों के साथ बैठक आज
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चेन्नई। तमिलनाडु में केंद्र सरकार की प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने शनिवार को राज्य के सांसदों की बैठक बुलाई है, जिसमें परिसीमन के संभावित प्रभाव और तमिलनाडु के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर इसके असर पर चर्चा की जाएगी। यह बैठक शनिवार दोपहर 3 बजे चेन्नई के कलैवानार अरंगम में प्रस्तावित है। हालांकि, राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टी डीएमके ने इस बैठक से दूरी बनाने का फैसला किया है।

मुख्यमंत्री की ओर से बुलाई गई इस बैठक का उद्देश्य केंद्र के प्रस्तावित परिसीमन को लेकर राज्य के सांसदों के बीच विचार-विमर्श करना और तमिलनाडु के हितों से जुड़े मुद्दों पर साझा रुख तैयार करना बताया जा रहा है। बैठक को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब दक्षिणी राज्यों में परिसीमन को लेकर लंबे समय से यह चिंता जताई जाती रही है कि आबादी के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन से संसद में उनका मौजूदा राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।

डीएमके सांसद नहीं होंगे शामिल

डीएमके सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के सांसद मुख्यमंत्री विजय की अध्यक्षता में होने वाली बैठक में शामिल नहीं होंगे। यह फैसला बैठक से ठीक पहले राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, AIADMK ने भी बैठक से दूर रहने का निर्णय लिया है।

डीएमके पहले से ही प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया को लेकर केंद्र के सामने अपनी चिंताएं रखती रही है। पार्टी का तर्क है कि जिन दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण और अन्य सामाजिक नीतियों को प्रभावी तरीके से लागू किया, उन्हें इसका राजनीतिक नुकसान नहीं होना चाहिए।

बैठक में डीएमके की अनुपस्थिति के कारण राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों में से एक की आवाज सीधे तौर पर चर्चा में नहीं होगी। इसके बावजूद कांग्रेस, वाम दलों और कुछ अन्य दलों के सांसदों के बैठक में शामिल होने की संभावना ने इसे महत्वपूर्ण बना दिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, कुल 57 सांसदों में से करीब 20 सांसद बैठक में हिस्सा ले रहे हैं।

सांसदों को भेजा गया था निमंत्रण

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, तमिलनाडु के मुख्य सचिव एम. साई कुमार ने 6 और 7 अगस्त को राज्य के सांसदों को अलग-अलग निमंत्रण भेजे थे। निमंत्रण में बैठक के एजेंडे के तौर पर केंद्र सरकार की प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया और उसके तमिलनाडु पर संभावित प्रभाव पर चर्चा का उल्लेख किया गया था।

सरकार की कोशिश थी कि अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े सांसद एक मंच पर आकर परिसीमन के मुद्दे पर अपने विचार रखें और राज्य के हितों को ध्यान में रखते हुए आगे की रणनीति पर विचार करें।

हालांकि, डीएमके के बैठक में शामिल न होने के फैसले से इस पहल को लेकर राजनीतिक मतभेद साफ तौर पर सामने आ गए हैं।

परिसीमन को लेकर विजय पहले भी जता चुके हैं विरोध

मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय पहले भी केंद्र की प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया के खिलाफ अपना रुख स्पष्ट कर चुके हैं। जुलाई में करूर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि तमिलनाडु परिसीमन को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने आशंका जताई थी कि इससे दक्षिणी राज्यों की संसद में राजनीतिक आवाज कमजोर हो सकती है।

विजय का तर्क रहा है कि यदि निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन मुख्य रूप से आबादी के आधार पर किया गया तो जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें भविष्य में संसद में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिल सकता है।

उन्होंने यह भी चिंता जताई थी कि प्रतिनिधित्व में बदलाव का असर केंद्र से मिलने वाले वित्तीय संसाधनों और नीतिगत फैसलों पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि तमिलनाडु सरकार इस मुद्दे को राज्य के अधिकार और हितों से जोड़कर देख रही है।

अप्रैल में भी संसद में हुआ था विवाद

परिसीमन का मुद्दा इसी साल अप्रैल में संसद में भी बड़ा राजनीतिक विवाद बन चुका है। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, जिसके जरिए महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रावधानों को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई थी, लोकसभा में आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका।

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, अप्रैल के विशेष सत्र में विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े थे। दो-तिहाई बहुमत की जरूरत पूरी नहीं होने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका। इसके बाद इससे जुड़े अन्य विधेयकों को भी वापस ले लिया गया था।

हालांकि, परिसीमन का मुद्दा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। केंद्र की ओर से भविष्य में इसे नए स्वरूप में आगे बढ़ाए जाने की संभावना को लेकर राजनीतिक दल सतर्क हैं। इसी वजह से तमिलनाडु में भी इस विषय पर चर्चा तेज है।

दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व की चिंता

परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की सबसे बड़ी चिंता संसद में उनकी सीटों के अनुपात से जुड़ी है। तमिलनाडु सहित कई दक्षिणी राज्य लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन किया है।

ऐसे में यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का निर्धारण आबादी के मौजूदा आंकड़ों के आधार पर होता है तो अपेक्षाकृत कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की सीटों में वृद्धि सीमित रह सकती है, जबकि अधिक आबादी वाले राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं।

तमिलनाडु में राजनीतिक दल इसे केवल चुनावी परिसीमन का विषय नहीं बल्कि संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा मानते हैं।

विजय सरकार की पहल से बढ़ी राजनीतिक चर्चा

मुख्यमंत्री विजय की ओर से सांसदों की बैठक बुलाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि राज्य सरकार परिसीमन के मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक चर्चा चाहती है। बैठक में शामिल होने वाले सांसदों से संभावित प्रभावों और राज्य की आगे की रणनीति पर राय लिए जाने की उम्मीद है।

हालांकि, डीएमके और AIADMK जैसे प्रमुख दलों के बहिष्कार से यह पहल राजनीतिक मतभेदों के बीच घिर गई है। इसके बावजूद बैठक में शामिल होने वाले दलों के सांसद परिसीमन के मुद्दे पर अपनी राय रखेंगे और तमिलनाडु के हितों को लेकर संभावित रणनीति पर चर्चा कर सकते हैं।

आगे क्या होगा, इस पर नजर

शनिवार की बैठक के बाद यह स्पष्ट हो सकता है कि तमिलनाडु सरकार केंद्र के सामने परिसीमन को लेकर किस तरह की मांग या आपत्ति रखती है। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण होगा कि बैठक में शामिल दल क्या कोई साझा प्रस्ताव तैयार कर पाते हैं।

फिलहाल मुख्यमंत्री विजय परिसीमन के विरोध में अपना रुख पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं, जबकि डीएमके ने बैठक में शामिल न होकर अपने राजनीतिक मतभेद का संकेत दिया है। ऐसे में तमिलनाडु में परिसीमन का मुद्दा आने वाले दिनों में भी राजनीतिक बहस के केंद्र में रहने की संभावना है।

राज्य की राजनीति में यह मुद्दा खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि परिसीमन का सीधा संबंध भविष्य में लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व से जुड़ा है। ऐसे में केंद्र की अगली पहल और तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टियों की प्रतिक्रिया पर पूरे देश की नजर बनी रहेगी।

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