
त्रिची : तमिलनाडु के त्रिची जिले में इस वर्ष राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) के परिणाम ने सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के सरकारी स्कूलों से परीक्षा में शामिल हुए 59 विद्यार्थियों में से केवल 7 छात्र ही निर्धारित योग्यता अंक प्राप्त कर परीक्षा उत्तीर्ण कर सके। यानी कुल परीक्षार्थियों में मात्र 11.8 प्रतिशत, अर्थात लगभग 12 प्रतिशत छात्रों ने ही सफलता हासिल की है।
यह आंकड़ा शिक्षा विभाग, अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बन गया है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र आर्थिक रूप से कमजोर और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं। ऐसे में मेडिकल शिक्षा का सपना देखने वाले विद्यार्थियों के लिए NEET जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में सफलता हासिल करना पहले से ही चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इस बार का परिणाम यह संकेत देता है कि सरकारी स्कूलों के छात्रों को प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी के लिए और अधिक मजबूत शैक्षणिक सहायता की आवश्यकता है।
जानकारी के अनुसार, त्रिची जिले के सरकारी स्कूलों के कुल 59 विद्यार्थियों ने इस वर्ष NEET-UG परीक्षा दी थी। इनमें से केवल 7 छात्र ही 720 में से 177 से अधिक अंक प्राप्त कर परीक्षा की न्यूनतम पात्रता सीमा पार कर सके। जबकि शेष 52 छात्र निर्धारित कटऑफ अंक हासिल नहीं कर पाए। इस प्रकार जिले का सफलता प्रतिशत केवल 11.8 प्रतिशत रहा।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि NEET केवल बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने से नहीं निकलती, बल्कि इसके लिए जीवविज्ञान, रसायन विज्ञान और भौतिकी की गहरी अवधारणात्मक समझ तथा नियमित अभ्यास की आवश्यकता होती है। सरकारी स्कूलों के कई छात्र संसाधनों, गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री और निजी कोचिंग की सुविधा के अभाव में प्रतियोगी परीक्षा में पीछे रह जाते हैं।
अभिभावकों का कहना है कि निजी स्कूलों के छात्रों की तुलना में सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के पास कोचिंग और अध्ययन के संसाधन सीमित होते हैं। कई छात्र आर्थिक परिस्थितियों के कारण अतिरिक्त कोचिंग नहीं ले पाते। ऐसे में केवल स्कूल स्तर की पढ़ाई के आधार पर NEET जैसी कठिन परीक्षा में सफलता प्राप्त करना आसान नहीं होता।
शिक्षाविदों का मानना है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले प्रतिभाशाली छात्रों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों को और मजबूत करने की आवश्यकता है। राज्य सरकार द्वारा विभिन्न स्तरों पर निःशुल्क NEET कोचिंग की व्यवस्था की गई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशिक्षण की गुणवत्ता, अभ्यास परीक्षाओं की संख्या और व्यक्तिगत मार्गदर्शन को और प्रभावी बनाने की जरूरत है। यदि छात्रों को कक्षा 11 से ही व्यवस्थित तैयारी कराई जाए तो परिणामों में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का कहना है कि कई छात्र कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई करते हैं। कुछ विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं, जहां पढ़ाई के लिए आवश्यक सुविधाएं सीमित हैं। इसके बावजूद कई छात्र मेडिकल क्षेत्र में करियर बनाने का सपना देखते हैं। ऐसे विद्यार्थियों को लगातार शैक्षणिक मार्गदर्शन, मानसिक प्रोत्साहन और परीक्षा रणनीति की जानकारी उपलब्ध कराना आवश्यक है।
शिक्षा विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि केवल परीक्षा से कुछ महीने पहले कोचिंग शुरू करने के बजाय पूरे शैक्षणिक सत्र के दौरान नियमित तैयारी कराई जानी चाहिए। विषयवार कमजोरियों की पहचान, नियमित टेस्ट, पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों का अभ्यास और समय प्रबंधन जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान देने से छात्रों का प्रदर्शन बेहतर हो सकता है।
इस परिणाम के बाद शिक्षा विभाग भी सरकारी स्कूलों के छात्रों की तैयारी की समीक्षा कर सकता है। अधिकारियों का मानना है कि जिन स्कूलों से बेहतर परिणाम आए हैं, वहां अपनाई गई शिक्षण पद्धति का अध्ययन कर उसे अन्य स्कूलों में भी लागू किया जा सकता है। साथ ही, कम सफलता वाले स्कूलों के लिए विशेष शैक्षणिक योजना तैयार करने पर भी विचार किया जा सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि केवल सफलता प्रतिशत के आधार पर सरकारी स्कूलों के छात्रों की क्षमता का आकलन नहीं किया जाना चाहिए। अनेक छात्र पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी होते हैं और सीमित संसाधनों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में शामिल होना भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। ऐसे विद्यार्थियों को आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रोत्साहन और बेहतर अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है।
छात्रों और अभिभावकों ने सरकार से मांग की है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले मेडिकल अभ्यर्थियों के लिए अधिक उन्नत निःशुल्क कोचिंग केंद्र स्थापित किए जाएं। इसके अलावा विशेषज्ञ शिक्षकों की नियुक्ति, डिजिटल अध्ययन सामग्री, नियमित मॉक टेस्ट और व्यक्तिगत काउंसलिंग जैसी सुविधाओं का विस्तार किया जाए ताकि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को भी समान अवसर मिल सकें।
त्रिची जिले का यह परिणाम एक ओर जहां सरकारी स्कूलों के सामने मौजूद चुनौतियों को उजागर करता है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था को और सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता की ओर भी संकेत देता है। यदि सरकारी स्कूलों के छात्रों को समय पर गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन, आधुनिक अध्ययन संसाधन और निरंतर अभ्यास का अवसर मिले, तो भविष्य में NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में उनकी सफलता का प्रतिशत निश्चित रूप से बढ़ सकता है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि आगामी सत्र में शिक्षा विभाग और राज्य सरकार इन परिणामों से क्या सीख लेते हुए सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए कौन से नए कदम उठाती है।





