तमिलनाडू

Madras High Court का बड़ा फैसला: मैटरनिटी लीव में भेदभाव नहीं हो सकता

Harrison
29 April 2026 6:27 PM IST
Madras High Court  का बड़ा फैसला: मैटरनिटी लीव में भेदभाव नहीं हो सकता
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Tamil Nadu तमिलनाडु: चेन्नई में मद्रास हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सरकारी कर्मचारियों को मैटरनिटी बेनिफिट्स देने में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता, चाहे मामला तीसरी प्रेग्नेंसी का ही क्यों न हो। कोर्ट ने साफ किया कि मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) एक अधिकार है और इसे सीमित या अलग-अलग परिस्थितियों में अलग तरीके से लागू करना उचित नहीं है।
यह फैसला जस्टिस आर. सुरेश कुमार और जस्टिस एन. सेंथिल कुमार की डिवीजन बेंच ने 28 अप्रैल को सुनाया। यह निर्णय शायी निशा नाम की याचिकाकर्ता की याचिका पर दिया गया, जिसने अपने मैटरनिटी लीव के अधिकार को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता ने 2 फरवरी 2026 से 1 फरवरी 2027 तक मैटरनिटी लीव की मांग की थी। लेकिन विल्लुपुरम के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज ने 27 मार्च 2026 को उसके आवेदन को खारिज कर दिया था। इसके अलावा, मोटर एक्सीडेंट्स क्लेम्स ट्रिब्यूनल, विल्लुपुरम द्वारा भी एक आदेश जारी किया गया था, जिसमें उसे 27 अप्रैल 2026 को ड्यूटी पर फिर से जॉइन करने के लिए कहा गया था।
इन दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों निचली अदालतों के आदेशों को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मातृत्व अवकाश केवल एक प्रशासनिक सुविधा नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा और मातृत्व से जुड़े अधिकारों का हिस्सा है। इसलिए इसे सीमित दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार या किसी भी सरकारी संस्था द्वारा इस प्रकार के लाभों में भेदभाव करना संविधान के समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
डिवीजन बेंच ने यह भी माना कि मैटरनिटी बेनिफिट्स
का उद्देश्य महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान और उसके बाद पर्याप्त समय और सुरक्षा देना है, ताकि वे अपने और अपने नवजात शिशु के स्वास्थ्य का ध्यान रख सकें। ऐसे में किसी भी कर्मचारी को सिर्फ इस आधार पर लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता कि यह उसकी तीसरी प्रेग्नेंसी है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक कानून में स्पष्ट रूप से कोई रोक नहीं है, तब तक ऐसे लाभ सभी पात्र महिला कर्मचारियों को समान रूप से दिए जाने चाहिए। सरकार की ओर से भी इस मामले में कोई ऐसा ठोस कारण नहीं दिया गया, जिससे याचिकाकर्ता की मांग को खारिज किया जा सके।
इस फैसले को महिला कर्मचारियों के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे यह संदेश गया है कि कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है और उनके मातृत्व संबंधी अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक है।
इस आदेश के बाद संबंधित विभागों को निर्देश दिया गया है कि वे याचिकाकर्ता को मैटरनिटी लीव का लाभ दें और पहले दिए गए सभी प्रतिकूल आदेशों को निरस्त मानें।
इस फैसले से सरकारी सेवा में कार्यरत महिला कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद है, खासकर उन मामलों में जहां प्रेग्नेंसी के आधार पर लीव या अन्य लाभों में बाधा उत्पन्न की जाती है।
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