
चेन्नई। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कझगम यानी TVK सरकार के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने छह अक्टूबर को होने वाले विधानसभा उपचुनावों में TVK के साथ जाने के बजाय अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया है। हालांकि, दोनों वामदलों ने स्पष्ट किया है कि चुनावी मुकाबले के बावजूद विजय सरकार को दिया जा रहा उनका बाहरी समर्थन फिलहाल जारी रहेगा। इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को सरकार से समर्थन वापसी नहीं कहा जा सकता।
राज्य में धारापुरम और मदुरंतकम विधानसभा सीटों पर छह अक्टूबर को मतदान होना है। वामदलों के बीच हुए समझौते के अनुसार CPI धारापुरम सीट से उम्मीदवार उतारेगी, जबकि CPI(M) मदुरंतकम में चुनाव लड़ेगी। दोनों दलों ने TVK के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन के साथ चुनावी समझौता नहीं किया है। इससे इन सीटों पर मुकाबला अधिक दिलचस्प होने की संभावना है।
वामदलों का कहना है कि विधानसभा चुनाव के बाद उन्होंने विशेष राजनीतिक परिस्थितियों में विजय सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। यह फैसला राज्य में संवैधानिक संकट और राज्यपाल शासन जैसी स्थिति से बचने तथा भाजपा को सत्ता से दूर रखने के उद्देश्य से किया गया था। इसके बावजूद CPI और CPI(M) ने औपचारिक रूप से TVK के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होने से परहेज किया है।
CPI(M) के प्रदेश सचिव पी. षणमुगम ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी का विजय सरकार को बाहरी समर्थन जारी रहेगा। उपचुनाव में अलग उम्मीदवार उतारने का मतलब समर्थन वापस लेना नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि वामदल अपनी राजनीतिक और वैचारिक पहचान बनाए रखना चाहते हैं। इसी कारण उन्होंने TVK, द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन और अन्नाद्रमुक-भाजपा खेमे से अलग चुनाव लड़ने का रास्ता चुना है। वामदलों के इस रुख को लेकर उनके भीतर भी अलग-अलग राय सामने आई है।
यह स्थिति तमिलनाडु की राजनीति में एक विरोधाभास पैदा करती दिखाई दे रही है। CPI और CPI(M) विधानसभा में जिस सरकार को समर्थन दे रहे हैं, उपचुनाव के मैदान में उसी सरकार की प्रमुख पार्टी के विरुद्ध प्रचार करेंगे। चुनाव अभियान के दौरान वामदलों को मतदाताओं के सामने यह बताना होगा कि TVK सरकार को समर्थन देने के बावजूद उसके उम्मीदवारों का विरोध क्यों किया जा रहा है।
वामदलों के कुछ नेताओं को आशंका है कि अलग चुनाव लड़ने से पार्टी की वास्तविक चुनावी ताकत सामने आ सकती है। दूसरी ओर, स्वतंत्र उम्मीदवार उतारने के पक्षधर नेताओं का तर्क है कि अपनी राजनीतिक जमीन और संगठन को बचाए रखने के लिए चुनाव लड़ना जरूरी है। यदि प्रत्येक चुनाव में TVK के साथ समझौता किया गया तो वामपंथी दलों की अलग पहचान और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री विजय ने हाल में सत्तारूढ़ गठबंधन को “सेक्युलर सोशल जस्टिस विक्ट्री अलायंस” नाम देने की घोषणा की थी। चेन्नई में आयोजित गठबंधन की बैठक में कांग्रेस, वीसीके, एमडीएमके और आईयूएमएल सहित कई सहयोगी दलों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। CPI और CPI(M) के नेताओं ने इस बैठक में हिस्सा नहीं लिया था। इससे पहले ही संकेत मिल गए थे कि दोनों वामदल सरकार का समर्थन जारी रखते हुए भी सत्तारूढ़ गठबंधन से औपचारिक दूरी बनाए रखना चाहते हैं।
विधानसभा चुनाव में TVK बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई थी। बाद में कांग्रेस तथा कुछ छोटे दलों और वामपंथी पार्टियों के समर्थन से विजय के नेतृत्व में सरकार बनी। इस कारण सरकार की स्थिरता सहयोगी एवं समर्थन देने वाले दलों के रुख पर निर्भर है। CPI और CPI(M) के पास दो-दो विधायक बताए गए हैं। यदि दोनों पार्टियां भविष्य में सरकार से समर्थन वापस लेती हैं तो सदन का गणित विजय सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है। अभी ऐसी कोई घोषणा नहीं की गई है।
उपचुनाव का परिणाम विधानसभा के संख्याबल के साथ मुख्यमंत्री विजय की राजनीतिक पकड़ की परीक्षा भी होगा। मदुरंतकम सीट पर उपचुनाव की आवश्यकता अन्नाद्रमुक विधायक मरगथम कुमारवेल के इस्तीफे और TVK में शामिल होने के बाद पड़ी। TVK ने यहां उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया है। CPI(M) के अलग उम्मीदवार उतारने से सत्तारूढ़ दल के सामने अपने ही बाहरी समर्थक से मुकाबले की स्थिति बन गई है।
धारापुरम में भी CPI की मौजूदगी चुनाव को बहुकोणीय बना सकती है। TVK के अलावा द्रमुक और अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले राजनीतिक खेमे भी उपचुनाव में अपनी ताकत दिखाने का प्रयास करेंगे। ऐसे में मतों का बंटवारा चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकता है। चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार दोनों सीटों पर मतदान छह अक्टूबर और मतगणना नौ अक्टूबर को होगी।
वामदलों का यह फैसला मुख्यमंत्री विजय के लिए तत्काल सत्ता का संकट पैदा नहीं करता, लेकिन राजनीतिक दबाव अवश्य बढ़ाता है। TVK को उपचुनाव में अपने उम्मीदवारों को जिताने के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वामदलों से उसका संवाद पूरी तरह समाप्त न हो। यदि चुनाव प्रचार के दौरान दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज होते हैं तो इसका असर विधानसभा में उनके संबंधों पर पड़ सकता है।
फिलहाल CPI और CPI(M) ने समर्थन जारी रखने की बात कही है। इसलिए “विजय की कुर्सी खतरे में” कहना जल्दबाजी होगी। वास्तविक संकट तभी पैदा होगा, जब कोई सहयोगी दल औपचारिक रूप से समर्थन वापस ले अथवा सरकार विधानसभा में बहुमत साबित करने में असफल हो। अभी का घटनाक्रम चुनावी दूरी और गठबंधन के भीतर राजनीतिक मतभेद का संकेत है, सरकार गिरने का नहीं।





