
चेन्नई : मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु में वन्यजीव संरक्षण और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए राज्य सरकार को तीन अंतिम रूप से तय किए गए हाथी गलियारों (एलीफेंट कॉरिडोर) की अधिसूचना (नोटिफिकेशन) जल्द जारी करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि जिन हाथी गलियारों को अंतिम रूप दिया जा चुका है, उनके संबंध में अधिसूचना जारी करने में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए।
यह मामला पशु कल्याण कार्यकर्ता एस. मुरलीधरन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में तमिलनाडु के विभिन्न हिस्सों में हाथियों के प्राकृतिक आवागमन मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की गई थी।
मामले की सुनवाई मद्रास हाई कोर्ट की उस विशेष पीठ ने की, जो पर्यावरण, वन और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े मामलों की सुनवाई करती है। न्यायमूर्ति एन. सतीशकुमार और न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान वन विभाग की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट का अवलोकन किया।
वन विभाग ने अदालत के समक्ष अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि तमिलनाडु में कुल 41 संभावित हाथी गलियारों की पहचान की गई है। इन गलियारों का उद्देश्य हाथियों के प्राकृतिक आवागमन को सुरक्षित बनाए रखना और वन क्षेत्रों के बीच उनके निर्बाध आवागमन को सुनिश्चित करना है।
रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से तीन हाथी गलियारों को अंतिम रूप दिया जा चुका है। इनमें जवालागिरी-अंचेट्टी, जवालागिरी-ठाकट्टी और जवालागिरी-पिल्लिकल हाथी गलियारे शामिल हैं। विभाग ने अदालत को बताया कि इन तीनों गलियारों से संबंधित प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और इन्हें अंतिम रूप दे दिया गया है।
वन विभाग ने यह भी जानकारी दी कि 12 अन्य हाथी गलियारों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया जारी है। इन प्रस्तावित गलियारों के संबंध में आवश्यक सर्वेक्षण, भूमि संबंधी औपचारिकताएं और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की जा रही हैं। विभाग ने यह भी बताया कि कुछ प्रस्तावित गलियारों को विभिन्न कारणों से आगे नहीं बढ़ाया गया और उन्हें छोड़ दिया गया है।
रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जिन तीन हाथी गलियारों को अंतिम रूप दिया जा चुका है, उनके संबंध में अधिसूचना जारी करने की प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाए। अदालत ने कहा कि अधिसूचना जारी होने से इन क्षेत्रों को कानूनी संरक्षण मिलेगा और हाथियों के प्राकृतिक आवागमन को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि हाथी गलियारों का संरक्षण केवल वन्यजीवों की सुरक्षा का विषय नहीं है, बल्कि इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में भी महत्वपूर्ण सहायता मिलती है। जब हाथियों के पारंपरिक रास्ते सुरक्षित रहते हैं, तो उनके आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश की संभावना कम होती है, जिससे जनहानि और संपत्ति के नुकसान की घटनाओं में भी कमी आ सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, तमिलनाडु देश के उन राज्यों में शामिल है जहां हाथियों की बड़ी आबादी पाई जाती है। राज्य के कई वन क्षेत्र कर्नाटक और केरल के जंगलों से जुड़े हुए हैं, इसलिए हाथियों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में आवागमन स्वाभाविक है। यदि इन प्राकृतिक मार्गों पर अतिक्रमण या अन्य बाधाएं उत्पन्न होती हैं, तो हाथियों का रुख गांवों और कृषि क्षेत्रों की ओर हो सकता है।
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि हाथी गलियारों की कानूनी अधिसूचना से संरक्षण कार्यों को मजबूती मिलेगी। इससे वन विभाग को इन क्षेत्रों में अतिक्रमण रोकने, पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने और आवश्यक संरक्षण उपाय लागू करने में सुविधा होगी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार और वन विभाग से संरक्षण संबंधी कार्यों में तेजी लाने की अपेक्षा भी जताई। अदालत ने कहा कि वन्यजीव संरक्षण से जुड़े मामलों में समयबद्ध कार्रवाई आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की पर्यावरणीय या वन्यजीव संबंधी समस्या उत्पन्न न हो।
मामले की सुनवाई के अंत में खंडपीठ ने राज्य सरकार को तीन अंतिम रूप से स्वीकृत हाथी गलियारों की अधिसूचना जारी करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई तक मामले को स्थगित कर दिया।
वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में इस आदेश को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हाथियों के प्राकृतिक आवागमन मार्गों को प्रभावी ढंग से संरक्षित किया जाता है, तो इससे जैव विविधता के संरक्षण के साथ-साथ मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष को भी कम करने में मदद मिलेगी। आने वाले समय में राज्य सरकार द्वारा अदालत के निर्देशों के अनुरूप अधिसूचना जारी किए जाने पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।





