तमिलनाडू
बेटे का DNA टेस्ट कराने पहुंचा पति, हाई कोर्ट ने ठोका 50 हजार जुर्माना
Rajeshwari Nishad
28 Oct 2026 12:59 PM IST

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चेन्नई : तमिलनाडु में पति-पत्नी के बीच विवाद का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां एक व्यक्ति ने शादी के कई साल बाद अपने ही बेटे के जैविक पिता होने पर सवाल खड़े कर दिए। उसने दावा किया कि बच्चा उसका नहीं है और सच्चाई सामने लाने के लिए डीएनए टेस्ट कराया जाना चाहिए। मामला पहले निचली अदालत में पहुंचा, लेकिन वहां से राहत नहीं मिलने पर पति ने मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, हाई कोर्ट से भी उसे बड़ा झटका लगा। अदालत ने डीएनए टेस्ट की मांग खारिज करते हुए पति पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों में बच्चे को मोहरा बनाना और पत्नी के चरित्र पर बिना ठोस सबूत सवाल उठाना स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह फैसला मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने 9 अक्टूबर 2026 को सुनाया था।
2008 में हुई शादी, दो साल बाद बेटे का जन्म
मामले की शुरुआत 24 नवंबर 2008 से होती है, जब तमिलनाडु के एक युवक और युवती की शादी हुई थी। शादी के बाद दोनों ने अपना वैवाहिक जीवन शुरू किया। कुछ समय बाद उनके घर बेटे का जन्म हुआ।शुरुआती दिनों में पति-पत्नी के बीच संबंध सामान्य थे, लेकिन समय बीतने के साथ दोनों के बीच विवाद बढ़ने लगे। आपसी मतभेद इतने गंभीर हो गए कि पत्नी को पति से अलग रहना पड़ा।इसके बाद महिला ने अपने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा से संबंधित शिकायत दर्ज कराई। यह मामला धीरे-धीरे अदालत तक पहुंच गया।
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, महिला ने 12 अगस्त 2013 को घरेलू हिंसा से संबंधित कार्रवाई शुरू की थी। बाद में मामला तिरुवन्नामलाई जिले के कलासापक्कम स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पहुंचा।इसी कानूनी विवाद के दौरान पति ने अपने बेटे के जैविक पिता होने पर संदेह जताना शुरू कर दिया।
पति बोला- बच्चा मेरा नहीं, कराना चाहता हूं DNA टेस्ट
घरेलू हिंसा का मामला अदालत में लंबित रहने के दौरान पति ने दावा किया कि उसकी पत्नी से जन्मा बेटा उसका जैविक बच्चा नहीं है।अपने दावे को साबित करने के लिए उसने बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की। पति का कहना था कि वैज्ञानिक जांच से यह स्पष्ट हो जाएगा कि वह बच्चे का वास्तविक पिता है या नहीं।साल 2023 में उसने निचली अदालत में डीएनए परीक्षण के लिए आवेदन दाखिल किया। आवेदन में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख किया गया।
हालांकि, अदालत ने पति की मांग स्वीकार नहीं की। निचली अदालत ने पाया कि पति ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे साबित हो कि बच्चे के गर्भधारण की संभावित अवधि के दौरान पति-पत्नी के बीच संपर्क की संभावना नहीं थी।इसके बाद 1 दिसंबर 2023 को निचली अदालत ने डीएनए टेस्ट कराने का आवेदन खारिज कर दिया।
निचली अदालत से झटका लगा तो हाई कोर्ट पहुंचा पति
निचली अदालत का फैसला आने के बाद भी पति ने हार नहीं मानी। उसने आदेश को चुनौती देते हुए मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।पति ने हाई कोर्ट के सामने दलील दी कि डीएनए परीक्षण आवश्यक है, क्योंकि इससे बच्चे के पितृत्व से संबंधित विवाद का समाधान हो सकता है।उसका कहना था कि बिना वैज्ञानिक जांच के सच्चाई सामने नहीं आएगी। दूसरी ओर, अदालत के सामने यह सवाल भी था कि क्या केवल संदेह के आधार पर किसी बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया जा सकता है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति शमीम अहमद की पीठ ने की। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और निचली अदालत के रिकॉर्ड का अध्ययन किया।हाई कोर्ट ने पाया कि पति ने लंबे समय तक इस तरह का कोई आवेदन नहीं किया था। घरेलू हिंसा की कार्यवाही शुरू होने के लगभग दस साल बाद उसने बच्चे के पितृत्व पर सवाल उठाते हुए डीएनए टेस्ट की मांग की थी।अदालत ने इस देरी को भी महत्वपूर्ण माना।
बच्चे को वैवाहिक विवाद का मोहरा नहीं बना सकते- हाई कोर्ट
सुनवाई के दौरान मद्रास हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि डीएनए परीक्षण को वैवाहिक विवादों में पत्नी की कथित बेवफाई साबित करने का आसान रास्ता नहीं बनाया जा सकता।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे की पहचान, सामाजिक प्रतिष्ठा और उसके अधिकारों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
अदालत के अनुसार, विवाह के दौरान जन्मे बच्चे के वैध होने के संबंध में कानून एक महत्वपूर्ण अनुमान स्थापित करता है। केवल संदेह या आरोप के आधार पर इस अनुमान को चुनौती नहीं दी जा सकती।इसके लिए मजबूत प्रारंभिक साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक होता है। विशेष रूप से यह दिखाना जरूरी है कि गर्भधारण की संभावित अवधि में पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध स्थापित होने की संभावना नहीं थी।
हाई कोर्ट ने कहा कि बच्चे को माता-पिता के बीच चल रहे विवाद का साधन नहीं बनाया जा सकता। डीएनए जांच का आदेश देने से पहले उसकी आवश्यकता और संभावित प्रभावों पर विचार करना जरूरी है।
पत्नी को अपमानित करने पर पति पर 50 हजार का जुर्माना
मद्रास हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।अदालत ने निचली अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि डीएनए टेस्ट कराने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है।न्यायमूर्ति शमीम अहमद ने यह भी माना कि पति की इस कार्रवाई का उद्देश्य पत्नी को अपमानित करना और समाज में उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना था।इसी आधार पर अदालत ने पति पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। यह राशि पत्नी को देने का निर्देश दिया गया।हाई कोर्ट का यह फैसला बताता है कि किसी भी वैवाहिक विवाद में व्यक्तिगत आरोप लगाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि डीएनए जांच अपने आप में प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन उसके लिए पर्याप्त और ठोस आधार होना चाहिए।
DNA टेस्ट को लेकर कानून क्या कहता है?
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 के अनुसार, वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को सामान्यतः वैध संतान माना जाता है। इस कानूनी अनुमान को चुनौती देने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि संबंधित अवधि में पति-पत्नी के बीच संपर्क की संभावना नहीं थी।
डीएनए परीक्षण वैज्ञानिक रूप से जैविक संबंधों का पता लगाने में मदद कर सकता है। हालांकि, अदालतें ऐसे परीक्षण का आदेश देते समय निजता, गरिमा और बच्चे के हितों का भी ध्यान रखती हैं।मद्रास हाई कोर्ट का ताजा फैसला इसी सिद्धांत को मजबूत करता है कि केवल शक के आधार पर बच्चे और मां को अनावश्यक कानूनी तथा सामाजिक परेशानियों में नहीं डाला जा सकता।
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