
चेन्नई: तमिलनाडु की बढ़ती बिजली आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए लगभग 12,778 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से शुरू किया गया उप्पुर सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्रोजेक्ट पिछले कई वर्षों से विभिन्न कारणों से ठप पड़ा हुआ है। पर्यावरणीय मंजूरी में देरी, स्थानीय लोगों का विरोध, न्यायालयों में लंबित मामले और प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लेने में हुई देरी के कारण यह महत्वाकांक्षी परियोजना आज भी अधूरी है। इस बीच, परियोजना पर अब तक लगभग 5,847 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन बिजली उत्पादन शुरू नहीं हो सका है।
सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार अब इस परियोजना के भविष्य को लेकर गंभीरता से विचार कर रही है। सरकार के सामने दो प्रमुख विकल्प हैं—पहला, परियोजना को उसके मूल स्थान उप्पुर में ही आगे बढ़ाया जाए, और दूसरा, इसे थूथुकुडी ज़िले के उडांगुडी क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया जाए, जहां पहले से ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ा बुनियादी ढांचा मौजूद है। इस संबंध में विभिन्न विभागों और विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श जारी है।
तमिलनाडु में औद्योगिक विकास, शहरीकरण और घरेलू उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग के कारण बिजली की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। राज्य सरकार लंबे समय से उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए नई ऊर्जा परियोजनाओं पर काम कर रही है। इसी उद्देश्य से उप्पुर सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्रोजेक्ट की परिकल्पना की गई थी। इस परियोजना से राज्य के बिजली उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद थी, जिससे भविष्य में बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलती।
हालांकि, परियोजना की शुरुआत के बाद से ही इसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मुद्दों के कारण आवश्यक मंजूरियां समय पर नहीं मिल सकीं। स्थानीय निवासियों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों ने भी परियोजना का विरोध किया। उनका कहना था कि ताप विद्युत परियोजना से समुद्री पारिस्थितिकी, मत्स्य संसाधनों और आसपास के पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा भूमि, प्रदूषण और अन्य मुद्दों को लेकर दायर याचिकाओं के कारण मामला न्यायालयों तक पहुंच गया, जिससे परियोजना की प्रगति और धीमी हो गई।
प्रशासनिक स्तर पर भी कई प्रक्रियाएं लंबित रहीं। बदलती नीतियों, तकनीकी मूल्यांकन और वित्तीय पुनर्विचार के कारण परियोजना समय पर आगे नहीं बढ़ सकी। परिणामस्वरूप, वर्षों बीत जाने के बावजूद निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया और परियोजना अधूरी रह गई।
जानकारों का कहना है कि अब तक खर्च किए जा चुके 5,847 करोड़ रुपये सार्वजनिक धन का बड़ा निवेश हैं। ऐसे में यदि परियोजना को पूरी तरह रद्द किया जाता है, तो यह वित्तीय दृष्टि से बड़ा नुकसान माना जाएगा। दूसरी ओर, यदि इसे किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित किया जाता है, तो पहले से किए गए निर्माण, भूमि विकास और अन्य बुनियादी कार्यों का कितना उपयोग हो सकेगा, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सूत्रों के अनुसार, सरकार इस संभावना का भी अध्ययन कर रही है कि यदि परियोजना को उडांगुडी स्थानांतरित किया जाता है, तो वहां उपलब्ध आधारभूत सुविधाओं, बंदरगाह की निकटता और कोयले की आपूर्ति व्यवस्था का लाभ मिल सकता है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि पहले से विकसित औद्योगिक क्षेत्र होने के कारण उडांगुडी में परियोजना को अपेक्षाकृत तेज़ी से आगे बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए नई तकनीकी, वित्तीय और पर्यावरणीय स्वीकृतियों की आवश्यकता पड़ सकती है।
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि तमिलनाडु में अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन सौर और पवन ऊर्जा की उपलब्धता मौसम पर निर्भर रहती है। ऐसे में ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने के लिए ताप विद्युत संयंत्रों की भी महत्वपूर्ण भूमिका बनी रहती है। सुपर क्रिटिकल तकनीक आधारित ताप विद्युत संयंत्र पारंपरिक संयंत्रों की तुलना में अधिक दक्ष माने जाते हैं और अपेक्षाकृत कम ईंधन में अधिक बिजली उत्पादन करने की क्षमता रखते हैं। इसलिए इस परियोजना को राज्य की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया था।
विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने परियोजना में हुई देरी और बढ़ते खर्च पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि समय पर निर्णय लिए जाते और विभिन्न मंजूरियों की प्रक्रिया तेज़ होती, तो परियोजना अब तक पूरी हो चुकी होती। उनका यह भी कहना है कि वर्षों तक परियोजना लंबित रहने से लागत में और वृद्धि होने की संभावना है, जिसका अतिरिक्त बोझ सरकारी खजाने पर पड़ेगा।
दूसरी ओर, उद्योग जगत का मानना है कि राज्य में लगातार बढ़ती बिजली मांग को देखते हुए नई उत्पादन क्षमता विकसित करना आवश्यक है। यदि बड़े बिजली संयंत्र समय पर तैयार नहीं हुए, तो भविष्य में उद्योगों और अन्य क्षेत्रों को बिजली आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी रह सकती है।
फिलहाल राज्य सरकार परियोजना की व्यवहार्यता, आर्थिक प्रभाव, पर्यावरणीय पहलुओं और कानूनी स्थिति का व्यापक अध्ययन कर रही है। इसके बाद ही यह अंतिम निर्णय लिया जाएगा कि उप्पुर सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्रोजेक्ट को उसके मूल स्थान पर पुनः शुरू किया जाए या उसे थूथुकुडी ज़िले के उडांगुडी में स्थानांतरित कर आगे बढ़ाया जाए।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि परियोजना के संबंध में जल्द और स्पष्ट निर्णय लेना आवश्यक है, ताकि पहले से किए गए भारी निवेश का बेहतर उपयोग हो सके और तमिलनाडु की भविष्य की बिजली आवश्यकताओं को समय पर पूरा करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें। अब सभी की निगाहें राज्य सरकार के आगामी फैसले पर टिकी हैं, जो इस महत्वाकांक्षी परियोजना की दिशा और भविष्य दोनों तय करेगा।





