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पहाड़ों में गहरा रहा जल संकट
नई दिल्ली: भारतीय हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक झरनों के सूखने और मौसमी होने की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। विशेषज्ञों और जल संरक्षण से जुड़े संगठनों ने अब केंद्र सरकार से झरनों और उनके रिचार्ज क्षेत्रों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर की अलग नीति बनाने की मांग की है। हालिया आकलनों के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र के करीब आधे स्थायी झरने या तो सूख चुके हैं या मौसमी हो गए हैं।
प्राकृतिक झरने हिमालयी गांवों के लिए केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि खेती, पशुपालन और स्थानीय पारिस्थितिकी की रीढ़ भी हैं। पहाड़ी इलाकों में बड़ी आबादी पेयजल और घरेलू जरूरतों के लिए इन्हीं पर निर्भर रहती है। झरनों का प्रवाह कम होने से कई गांवों में गर्मियों के दौरान पानी की गंभीर समस्या खड़ी हो रही है।
इस मुद्दे को लेकर 3 अक्टूबर को सिलीगुड़ी में आयोजित एक बहु-पक्षीय संवाद में सरकार, जल आपूर्ति विभाग, वन विभाग, शोध संस्थानों, स्थानीय निकायों और नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक में शामिल विशेषज्ञों ने कहा कि झरनों को केवल स्थानीय जल स्रोत नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण प्राकृतिक जल अवसंरचना के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने एक ऐसे राष्ट्रीय ढांचे की मांग की, जिसमें झरनों की मैपिंग, निगरानी, संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए स्पष्ट जिम्मेदारी तय हो।
विशेषज्ञों के अनुसार समस्या का एक बड़ा कारण यह है कि झरनों से जुड़ी जिम्मेदारी अलग-अलग विभागों में बंटी हुई है। जल संसाधन, ग्रामीण विकास, वन और पर्यावरण विभाग अपने-अपने स्तर पर काम करते हैं, लेकिन इनके बीच मजबूत समन्वय की कमी बनी हुई है। इसी वजह से कई स्थानों पर झरनों के पुनर्जीवन के प्रयास छोटे प्रोजेक्ट तक सीमित रह जाते हैं।
झरनों के सूखने के पीछे जलवायु परिवर्तन, अनियमित बारिश, भूमि उपयोग में बदलाव, वनों की कटाई, सड़कों और निर्माण गतिविधियों के कारण पहाड़ी भूजल प्रणाली में बदलाव जैसे कई कारण बताए जाते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में झरने भूजल के प्राकृतिक निकास बिंदु होते हैं, इसलिए उनके रिचार्ज क्षेत्र में बदलाव का सीधा असर पानी के प्रवाह पर पड़ सकता है।
सरकारी स्तर पर भी समस्या को लेकर कुछ पहल की जा रही हैं। अरुणाचल प्रदेश में मई 2026 में संवेदनशील झरनों की मैपिंग, आकलन और पुनर्जीवन के लिए वैज्ञानिक अध्ययन शुरू करने का समझौता किया गया था। वहीं हिमालयी राज्यों में ‘स्प्रिंगशेड मैनेजमेंट’ और ‘ग्राम जल अभयारण्य’ जैसे मॉडल के जरिए सूखते झरनों को पुनर्जीवित करने की कोशिश चल रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय स्तर की ऐसी कोशिशें महत्वपूर्ण हैं, लेकिन समस्या के आकार को देखते हुए राष्ट्रीय नीति जरूरी है। इसमें हर झरने का डेटाबेस, रिचार्ज क्षेत्र की पहचान, भूजल निगरानी, समुदाय की भागीदारी और अलग फंडिंग व्यवस्था शामिल होनी चाहिए।
2026 में प्रकाशित एक शोध में भी हिमालयी झरनों के सूखने को भारत की जल सुरक्षा से जुड़ा गंभीर खतरा बताया गया है। शोध में सुझाव दिया गया कि झरनों को राष्ट्रीय जल नीति में स्पष्ट पहचान दी जाए और उनके प्रबंधन के लिए एक जिम्मेदार नोडल व्यवस्था बनाई जाए।
अगर समय रहते इन जल स्रोतों को बचाने के लिए बड़े स्तर पर कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर केवल पेयजल पर नहीं, बल्कि पहाड़ी कृषि, पलायन, जैव विविधता और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ अब झरनों को बचाने की पहल को स्थानीय योजना से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने की मांग कर रहे हैं।
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