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सजा गंगटोक साहित्य उत्सव संपन्न
गंगटोक: गंगटोक में शुक्रवार को तीन दिवसीय 'सिक्किम कला और साहित्य महोत्सव' (SALF) का समापन हुआ। इस महोत्सव में साहित्य, कविता, संगीत और कला का एक शानदार संगम देखने को मिला। विभिन्न आवाज़ों, संस्कृतियों और रचनात्मक अभिव्यक्तियों का जश्न मनाते हुए, यह महोत्सव देश-विदेश के जाने-माने लेखकों, कवियों, पत्रकारों, कलाकारों, विचारकों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों के मिलने का एक मंच बना।
महोत्सव के आखिरी दिन विचारोत्तेजक चर्चाएं, मनमोहक प्रस्तुतियां, साहित्यिक अन्वेषण और कलात्मक सहयोग देखने को मिले। इस दिन ने कहानियों, पहचान और साझा अनुभवों का जश्न मनाने की महोत्सव की भावना को आगे बढ़ाया। भाषा, पलायन और क्षेत्रीय पहचान पर चर्चा से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मानसिक स्वास्थ्य, भू-राजनीति और महिलाओं के अनुभवों तक, आखिरी दिन ने यह याद दिलाया कि कला और साहित्य में समुदायों को जोड़ने, दृष्टिकोणों को चुनौती देने और सार्थक बातचीत को प्रेरित करने की कितनी ताकत है।
आखिरी दिन की शुरुआत 'खम्मा घणी सिक्किम: राजस्थानी लोक संगीत' सत्र से हुई, जिसमें मगदा खान और उनके समूह ने राजस्थान की समृद्ध लोक परंपराओं को महोत्सव में प्रस्तुत किया।
दिन के मुख्य आकर्षणों में से एक सत्र में प्रसिद्ध कवि और अनुवादक रंजीत होस्कोटे और सिक्किम के कवि गुरु टी. लद्दाखी शामिल थे। इस बातचीत में कविता के माध्यम से दृश्य कथाओं (विज़ुअल नैरेटिव्स) को पेश करने, अपनी पहचान को व्यक्त करने, और पर्यावरण व पारिस्थितिकी के साथ हमारे संबंधों जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
होस्कोटे की रचना 'जोनाहव्हेल' (Jonahwhale) पर चर्चा करते हुए, वक्ताओं ने पलायन, अपनापन और अपनी पहचान को अपनाने जैसे विषयों पर बात की। होस्कोटे ने कहा, "यही वजह है कि मैं समुद्र की ओर आकर्षित होता हूँ, क्योंकि पानी हमेशा से ही बंधनमुक्त रहा है।" उन्होंने बताया कि कैसे समुद्र का विशाल विस्तार रचनात्मक प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। उन्होंने आगे कहा कि नई भाषाओं के उभरने और बदलती हुई पहचानों के निर्माण में पलायन (माइग्रेशन) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए, लद्दाखी ने सिक्किम के ऐतिहासिक व्यापार मार्गों और पलायन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा विचारों के आवागमन में उनकी प्रासंगिकता की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि इन मार्गों के अपने अलग ही अर्थ और महत्व हैं।
होस्कोटे ने अपनी कविताओं की कुछ पंक्तियां पढ़कर सुनाईं, जिनमें शब्दों की गहराई और उनके विविध रंग झलक रहे थे—ऐसे शब्द जो विरोधाभासी भावनाओं को भी उजागर करते हैं। लद्दाखी ने अपनी कविताओं की प्रेरणाओं के बारे में भी बात की। उन्होंने अपनी कविता की कुछ पंक्तियाँ पढ़कर सुनाईं, जिनमें पहाड़ों, पहाड़ियों और प्रकृति के प्रति उनका गहरा लगाव झलकता था और जो वहाँ के परिदृश्य की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करती थीं।
आयोजकों के प्रयासों की सराहना करते हुए होसकोटे कहते हैं, "मुझे लगता है कि यह बहुत शानदार बात है कि हमारे देश भर में अलग-अलग विषयों और उद्देश्यों पर आधारित साहित्य महोत्सव (लिटरेचर फेस्टिवल) आयोजित किए जा रहे हैं।" उन्होंने न केवल SALF, बल्कि देश में होने वाले हर कला और साहित्य महोत्सव के आयोजकों की तारीफ की।
"द नेपाली इमेजिनेशन: बिटवीन माउंटेंस एंड मेमोरी" (नेपाली कल्पना: पहाड़ों और स्मृतियों के बीच) शीर्षक वाले एक अन्य सत्र में, लेखक चुडेन काबिमो, प्रज्वल पराजुली और शंकर देव ढकाल ने कवयित्री सुधा एम. राय के साथ मिलकर नेपाली साहित्यिक रचनाओं पर कल्पना, स्मृति और सांस्कृतिक विरासत के गहरे प्रभाव पर चर्चा की।
कवि और पत्रकार प्रबिन खालिंग द्वारा संचालित इस चर्चा में यह देखा गया कि किस तरह कहानी सुनाने की कला भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं के पार पीढ़ियों और समुदायों को आपस में जोड़ती है। इस सत्र में नेपाली भाषा की समकालीन वास्तविकताओं, समाज में इसकी प्रासंगिकता और इस क्षेत्र से जुड़ी कहानियों के ऐतिहासिक महत्व पर भी प्रकाश डाला गया।
पैनल में शामिल लोगों ने नेपाली भाषा के प्रति अपने गहरे लगाव और अपनी कहानियों में निहित शक्ति के बारे में बात की।
"द गोरखाज़ डॉटर" और "लैंड वेयर आई फ्ली" जैसी प्रशंसित कृतियों के लेखक पराजुली ने नेपाली भाषा को संरक्षित करने और बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि नेपाली भाषा की मूल भावनात्मक गहराई और बारीकियों को अक्सर दूसरी भाषाओं में अनुवाद के जरिए पूरी तरह से व्यक्त नहीं किया जा सकता।
ढकाल ने उन ऐतिहासिक प्रभावों के बारे में बात की जो उनके लेखन को आकार देते हैं। उन्होंने इस क्षेत्र के अतीत को दर्ज करने और उसे व्यापक दर्शकों तक पहुँचाने के महत्व पर जोर दिया।
वहीं, राय ने महिलाओं के उन संघर्षों पर ध्यान केंद्रित किया जिन्हें वह अपनी कविताओं के माध्यम से सामने लाती हैं। उन्होंने खुद को महिलाओं, विशेष रूप से इस क्षेत्र की महिलाओं की आवाज़ बताया।
तीसरे दिन एक पुरस्कार वितरण समारोह भी आयोजित किया गया, जिसमें इन तीन दिनों के दौरान हुई विभिन्न प्रतियोगिताओं में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले छात्रों को सम्मानित किया गया। इसके बाद देव आशीष मोथे ने एक संगीतमय प्रस्तुति दी। सिक्किम विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के छात्रों ने शेक्सपियर के नाटक "ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम" का एक रूपांतरण भी मंच पर प्रस्तुत किया। दिन भर की चर्चाओं में तकनीक, भू-राजनीति और मानसिक स्वास्थ्य मुख्य विषय रहे। “एंटर प्रॉम्प्ट: द ग्रेट गेम ऑफ AI” जैसे सत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रचनात्मकता तथा समाज पर इसके प्रभाव पर चर्चा की गई, जबकि “अ बॉर्डरलैंड स्टेट ऑफ माइंड” में पूर्वी हिमालय क्षेत्र की क्षेत्रीय पहचान, आजीविका और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का विश्लेषण किया गया। “कन्वर्सेशन्स फॉर द माइंड” में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, इससे जुड़े सामाजिक कलंक और खुलकर बातचीत करने के महत्व पर प्रकाश डाला गया।
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