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पहाड़ी इलाकों में जल सुरक्षा के लिए साझा प्रयास जरूरी
पूर्वी हिमालय: पहाड़ी क्षेत्रों में जल सुरक्षा को मजबूत बनाने और प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण के लिए झरनों के बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। पूर्वी हिमालयी संवाद में जल संसाधनों के संरक्षण, प्राकृतिक झरनों की उपयोगिता और विभिन्न पक्षों के बीच आपसी तालमेल को महत्वपूर्ण बताया गया। चर्चा का प्रमुख विषय पहाड़ी समुदायों के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से समन्वित प्रयासों को बढ़ावा देना रहा।
हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक झरने स्थानीय लोगों के लिए पानी के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। कई पहाड़ी गांवों में घरेलू जरूरतों, खेती और पशुपालन के लिए इन झरनों पर निर्भरता बनी रहती है। ऐसे में झरनों का संरक्षण केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और आजीविका से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
पूर्वी हिमालयी संवाद में इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया कि झरनों के प्रबंधन के लिए अलग-अलग स्तरों पर काम करने वाले विभागों, संस्थाओं और स्थानीय समुदायों के बीच सहयोग आवश्यक है। जल सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करने के लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत पर बल दिया गया। 8 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में आयोजित इस संवाद में जनप्रतिनिधियों, शोधकर्ताओं, सरकारी अधिकारियों और जल क्षेत्र के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का मुख्य विषय सिक्किम-दार्जिलिंग हिमालय में झरना जलग्रहण क्षेत्रों के प्रबंधन के माध्यम से पहाड़ी जल सुरक्षा को मजबूत बनाना था।
सूखते झरनों को लेकर विशेषज्ञों ने जताई चिंता
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताया कि पूर्वी हिमालय के कई क्षेत्रों में प्राकृतिक झरनों के सूखने और जल प्रवाह कम होने की समस्या सामने आ रही है। इससे स्थानीय समुदायों की जल जरूरतों को पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
25 संगठनों के सुझावों पर हुई चर्चा
SaciWATERs के डॉ. कबिंद्र शर्मा ने एक नीतिगत दस्तावेज प्रस्तुत किया। इसमें 3 अक्टूबर को दार्जिलिंग में आयोजित परामर्श बैठक में 25 संगठनों से मिले सुझाव और क्षेत्रीय सर्वेक्षण के निष्कर्ष शामिल थे। उन्होंने बताया कि केवल घरों तक पाइपलाइन पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। पानी की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक स्रोतों का संरक्षण भी जरूरी है। डॉ. शर्मा ने झरनों के प्रबंधन के लिए स्पष्ट संस्थागत जिम्मेदारियां निर्धारित करने, सरकारी योजनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने और जल पुनर्भरण क्षेत्रों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई।
पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक तकनीकों पर जोर
संवाद में सिक्किम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर लक्ष्मण शर्मा ने जल संरक्षण में स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान की उपयोगिता बताई। उन्होंने इस ज्ञान को शिक्षा और संस्थागत कार्यप्रणाली से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र के प्रतिनिधि ने झरनों से संबंधित आंकड़ों के संग्रह, सूचनाओं की उपलब्धता और प्रकृति आधारित प्रबंधन उपायों को महत्वपूर्ण बताया।
राष्ट्रीय नीति बनाने की जरूरत पर सहमति
संवाद के दौरान हिमालयी झरनों के प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समन्वित नीतिगत ढांचा विकसित करने का सुझाव दिया गया। इसके माध्यम से विभिन्न विभागों की जिम्मेदारियां स्पष्ट करने, जल स्रोतों की निगरानी बढ़ाने और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
सिक्किम के लोकसभा सांसद इंद्र हांग सुब्बा ने हिमालयी जल सुरक्षा को राष्ट्रीय नीतिगत चर्चाओं में अधिक महत्व देने की आवश्यकता बताई। कार्यक्रम में 2047 तक जल-सुरक्षित हिमालय के निर्माण और स्थानीय ज्ञान प्रणालियों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों से जोड़ने पर भी चर्चा हुई। बैठक का समापन जनप्रतिनिधियों, सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों, शोधकर्ताओं और पहाड़ी समुदायों के बीच सहयोग जारी रखने के आह्वान के साथ हुआ। प्रतिभागियों ने इस बात पर जोर दिया कि दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए केवल जल आपूर्ति की व्यवस्था बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन प्राकृतिक स्रोतों और जलग्रहण क्षेत्रों को भी सुरक्षित रखना होगा जिनसे पानी उपलब्ध होता है।
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