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Rajasthan राजस्थान। अरावली पहाड़ियों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने ही पूर्व आदेश पर रोक लगाए जाने के बाद राजस्थान की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस फैसले का स्वागत करते हुए राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने कहा कि यह निर्णय जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया है और वे इसका स्वागत करते हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे को गंभीरता और तात्कालिकता के साथ उठाया था।
टीकाराम जूली ने मीडिया से बातचीत में कहा कि अरावली पहाड़ियां केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं हैं, बल्कि यह राजस्थान और पूरे उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन की रीढ़ हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम उन लाखों लोगों की भावनाओं को मान्यता देता है, जो अरावली के संरक्षण को लेकर चिंतित हैं। जूली ने कहा, “हमने इस मुद्दे को बहुत गंभीरता से उठाया था और यह फैसला इस बात का संकेत है कि जनहित की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि अरावली क्षेत्र में खनन, निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों के कारण पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा है। इससे भूजल स्तर में गिरावट, वायु प्रदूषण और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार की नीतियों के कारण अरावली पहाड़ियों का अंधाधुंध दोहन हुआ, जिसे रोकना बेहद जरूरी था।
जूली ने यह भी कहा कि कांग्रेस पार्टी शुरू से ही अरावली के संरक्षण के पक्ष में रही है और भविष्य में भी इस मुद्दे को मजबूती से उठाती रहेगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद केंद्र और राज्य सरकारें पर्यावरण संरक्षण को लेकर और अधिक संवेदनशील रवैया अपनाएंगी।
गौरतलब है कि अरावली पहाड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का पूर्व आदेश कई परियोजनाओं और गतिविधियों पर असर डाल सकता था, जिससे स्थानीय लोगों, किसानों और पर्यावरणविदों में चिंता बढ़ गई थी। इस फैसले पर रोक लगने के बाद उन सभी पक्षों को राहत मिली है, जो रोजगार, पर्यावरण और स्थानीय जीवनशैली पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर आशंकित थे। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली पहाड़ियों का संरक्षण जलवायु संतुलन और जल संसाधनों की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। अरावली न केवल राजस्थान बल्कि दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के लिए भी प्रदूषण रोकने में अहम भूमिका निभाती है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इस मुद्दे ने राजस्थान में पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में नीतिगत निर्णयों और विकास परियोजनाओं की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
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