
Rajasthan राजस्थान: राजस्थान हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर रिज़र्वेशन से जुड़े अपने हालिया फैसले में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए विवादित एपिलॉग के कुछ हिस्सों को हटाने का आदेश दिया है। हालांकि, अदालत ने पूरे एपिलॉग को हटाने से इनकार कर दिया और स्पष्ट किया कि केवल कुछ पैराग्राफ ही अनावश्यक रूप से शामिल हो गए थे।
यह आदेश जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की बेंच ने दिया। कोर्ट ने माना कि एपिलॉग के कुछ हिस्से फैसले के लिए आवश्यक नहीं थे और गलती से शामिल हो गए थे।
इस मामले में 29 वर्षीय ट्रांसजेंडर याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील विवेक माथुर ने बताया कि अदालत ने स्पष्ट किया है कि कुछ टेक्स्ट को हटाना जरूरी था क्योंकि उसका न तो कोई उद्देश्य था और न ही वह निर्णय का अनिवार्य हिस्सा था।
दरअसल, 30 मार्च को दिए गए मूल फैसले में कोर्ट ने एक एपिलॉग जोड़ा था, जिसमें ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट एक्ट, 2026 को लेकर चिंता जताई गई थी। अदालत ने कहा था कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्वयं की जेंडर पहचान के संवैधानिक अधिकार को सीमित कर सकता है।मूल एपिलॉग में यह
भी चेतावनी दी गई थी कि यदि कानूनी जेंडर पहचान को सर्टिफिकेशन या प्रशासनिक प्रक्रिया पर निर्भर बनाया गया, तो यह व्यक्ति की पहचान जैसे मूलभूत अधिकार को राज्य के नियंत्रण में ले जाएगा। अदालत ने यह भी कहा था कि ऐसे कानूनी बदलाव संवैधानिक गारंटियों को कमजोर कर सकते हैं और ट्रांसजेंडर अधिकारों को व्यावहारिक रूप से बाधित कर सकते हैं।
हालांकि, संशोधित आदेश में हाई कोर्ट ने इन टिप्पणियों को हटा दिया और कहा कि ये अवलोकन केस के निपटारे के लिए आवश्यक नहीं थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुख्य निर्णय और उसमें दिए गए निर्देश ही लागू रहेंगे, जो उस समय की कानूनी स्थिति पर आधारित हैं।
यह मामला 2023 में जारी राज्य सरकार के एक नोटिफिकेशन को चुनौती देने से जुड़ा था, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को बिना किसी अलग आरक्षण ढांचे के अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी में शामिल किया गया था। याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को चुनौती दी थी और विशेष आरक्षण की मांग की थी।
संशोधित एपिलॉग में अदालत ने अपेक्षाकृत संयमित रुख अपनाते हुए कहा कि 2026 का संशोधन बदलते कानूनी परिदृश्य का हिस्सा है। साथ ही यह भी दोहराया कि मुख्य फैसले में दिए गए निर्देश उस समय की कानूनी स्थिति के अनुरूप हैं और वही प्रभावी रहेंगे।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव न्यायिक संयम का उदाहरण है, जहां अदालत ने अपने फैसले के दायरे को स्पष्ट करते हुए अनावश्यक टिप्पणियों को हटाया है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि अदालतें केवल उन मुद्दों तक ही सीमित रहना चाहती हैं, जो सीधे तौर पर मामले के निर्णय से जुड़े हों।
इस घटनाक्रम के बाद ट्रांसजेंडर अधिकारों और आरक्षण नीति को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है, और आने वाले समय में इस मुद्दे पर और कानूनी स्पष्टता की उम्मीद जताई जा रही है।





