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Delhi दिल्ली। अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह (8 से 14 दिसंबर) हर साल हमें याद दिलाता है कि भारत की असली खूबसूरती सिर्फ उसके महलों, मंदिरों या पहाड़ों में ही नहीं, बल्कि उन कारीगरों के हाथों में बसती है, जो मिट्टी, धातु, लकड़ी, कपड़े और रंगों से जादू रच देते हैं। इसमें राजस्थान का नाम सबसे ऊपर आता है। राजस्थानी कला न सिर्फ पुरानी परंपराओं को अपने में समेटे है, बल्कि अपने रंग, अंदाज और बारीकी से पूरी दुनिया को चकित करती है। इस खास सप्ताह में राजस्थान की हस्तकला की चर्चा करना जैसे रेत के कणों में इतिहास की चमक तलाशना है।
राजस्थान की धरती वैसे भी रंगों की खान है। यहां का हर इलाका किसी न किसी अनोखे शिल्प के लिए मशहूर है। जयपुर की गलियों में चलते ही आपको ब्लू पॉटरी की नीली-धुंधली खूबसूरती दिख जाएगी। यह कला फारसी शैली और चीनी ग्लेज तकनीक का ऐसा शानदार मेल है कि देखने वाला बरसों तक भूल नहीं पाता। प्लेटें, कटोरियां, शोपीस सब कुछ बेहद सुंदर लगता है।
इसी तरह जयपुर की मशहूर मीनाकारी भी किसी जादू से कम नहीं। सोने-चांदी के गहनों में भरी जाने वाली रंगीन परतें सूर्य की रोशनी में चमकती हैं तो ऐसा लगता है जैसे रंग खुद अपनी कहानी कह रहे हों। यह कला मुगल दौर से चली आ रही है और आज भी जयपुर इसका बड़ा केंद्र है। शादी-ब्याह के मौसम में इसकी मांग पूरे देश में बढ़ जाती है। अब बात करें जोधपुर की, तो लकड़ी की नक्काशी यहां की पहचान है। जोधपुर के कारीगर साधारण लकड़ी को इस तरह तराशते हैं कि वह शाही फर्नीचर में बदल जाती है। दरवाजे, चारपाइयां, झरोखे हर चीज में इतनी बारीकी कि देखने वाला हैरान रह जाए।
इसके साथ ही यहां की कोफ्तगिरी कला भी प्रसिद्ध है, जिसमें हथियारों या धातु की सतह पर सोने-चांदी के तार जड़े जाते हैं। पुराने जमाने के राजपूत सरदारों की तलवारें इसी कला से सजी रहती थीं। राजस्थान की एक और धरोहर है टेराकोटा कला, जो मिट्टी में बसे जीवन की खुशबू लिए हुए है। मोलेला और हरजी गांव इसके बड़े केंद्र हैं, जहां कारीगर हाथों में मिट्टी लेकर ऐसी मूर्तियां तैयार करते हैं, जो देखने में सरल पर बेहद आकर्षक होती हैं। घर की सजावट में इनकी मांग हमेशा रहती है।
बगरू और सांगानेर की छपाई पूरे देश में मशहूर है। लकड़ी के ब्लॉकों पर बने डिजाइन, प्राकृतिक रंग और कपड़े पर की जाने वाली छपाई एकदम देसी, सुंदर और टिकाऊ होती है। यही वजह है कि जयपुर की छपाई को फैशन डिजाइनर भी खूब पसंद करते हैं।
बीकानेर के ऊंट के चमड़े के शिल्प, जालौर के हाथ से बने खेसले और कठपुतलियों की पारंपरिक कला भी राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा हैं। ये सिर्फ वस्तुएं नहीं, बल्कि राजस्थान की कहानियां हैं जो पीढ़ियों से पीढ़ियों तक चली आ रही हैं।
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