
जयपुर। पंजाब में गुटबाजी से जूझ रही कांग्रेस के सामने अब राजस्थान में भी अंदरूनी विवाद की चुनौती खड़ी होती नजर आ रही है। पार्टी के भीतर अलग-अलग गुटों के बीच मतभेद की खबरों के बीच अब भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के नेताओं को कांग्रेस में शामिल किए जाने को लेकर नया विवाद सामने आया है। बताया जा रहा है कि इस कदम को लेकर राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व में नाराजगी है और पार्टी के अंदर एक बार फिर खींचतान बढ़ गई है।
जानकारी के अनुसार, BAP यानी भारत आदिवासी पार्टी के कुछ नेताओं की कांग्रेस में एंट्री पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मौजूदगी में हुई। इस कार्यक्रम के बाद प्रदेश कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इस फैसले पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि पार्टी में किसी भी नए नेता को शामिल करने से पहले संगठन स्तर पर चर्चा और सहमति जरूरी है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस के अंदर असंतोष की स्थिति बनती दिखाई दे रही है।
राजस्थान कांग्रेस में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के भीतर अशोक गहलोत और सचिन पायलट खेमों के बीच राजनीतिक मतभेद सामने आते रहे हैं। हालांकि समय-समय पर पार्टी नेतृत्व ने दोनों पक्षों के बीच तालमेल बनाने की कोशिश की, लेकिन चुनावी रणनीति और संगठनात्मक फैसलों को लेकर मतभेद की खबरें अक्सर सामने आती रही हैं।
अब BAP नेताओं की जॉइनिंग ने एक बार फिर पार्टी के अंदर शक्ति संतुलन और फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश नेतृत्व के कुछ नेताओं का मानना है कि आदिवासी क्षेत्रों में पार्टी की रणनीति और संगठन को ध्यान में रखते हुए ऐसे फैसले सामूहिक सहमति से लिए जाने चाहिए थे। वहीं, गहलोत समर्थक नेताओं का तर्क है कि नए नेताओं के आने से पार्टी का जनाधार बढ़ेगा और आगामी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी।
भारत आदिवासी पार्टी राजस्थान के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बना चुकी है। विधानसभा चुनावों में BAP ने आदिवासी क्षेत्रों में प्रभाव दिखाया था और कई सीटों पर उसका प्रदर्शन चर्चा में रहा था। ऐसे में कांग्रेस के लिए इस पार्टी से जुड़े नेताओं को अपने साथ जोड़ना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राजस्थान में आदिवासी वोट बैंक काफी अहम है। दक्षिण राजस्थान के कई जिलों में आदिवासी मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं। कांग्रेस लंबे समय से इन क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही है। ऐसे में BAP नेताओं की कांग्रेस में एंट्री को आदिवासी क्षेत्रों में पार्टी की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि, संगठन के भीतर विरोध का कारण केवल जॉइनिंग नहीं बल्कि निर्णय प्रक्रिया भी बताई जा रही है। प्रदेश कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि यदि पार्टी में बड़े राजनीतिक फैसले स्थानीय नेतृत्व को विश्वास में लेकर किए जाएं तो बेहतर समन्वय बना रहता है। उनका कहना है कि अचानक लिए गए फैसलों से कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
दूसरी ओर, कांग्रेस नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुटों के बीच संतुलन बनाए रखना है। पार्टी को एक ओर जहां संगठन को मजबूत करना है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न नेताओं और समूहों को साथ लेकर चलना भी जरूरी है। राजस्थान जैसे बड़े राज्य में पार्टी के लिए एकजुटता बनाए रखना आगामी चुनावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अशोक गहलोत की मौजूदगी में हुई जॉइनिंग के बाद यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि गहलोत राजस्थान कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल रहे हैं। उनके समर्थकों की राज्य की राजनीति में मजबूत भूमिका रही है। ऐसे में किसी भी बड़े राजनीतिक फैसले में उनकी भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर चर्चा होना स्वाभाविक है।
वहीं, सचिन पायलट खेमे और प्रदेश संगठन से जुड़े नेताओं की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि वह सभी नेताओं को साथ लेकर संगठन को आगे बढ़ाए और सार्वजनिक रूप से किसी भी प्रकार के मतभेद को बढ़ने से रोके।
फिलहाल कांग्रेस के भीतर BAP नेताओं की जॉइनिंग को लेकर शुरू हुआ विवाद कितना बड़ा रूप लेता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। पार्टी नेतृत्व की कोशिश होगी कि इस मुद्दे को जल्द सुलझाकर संगठनात्मक एकता का संदेश दिया जाए। राजस्थान में कांग्रेस के लिए यह समय रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि पार्टी को आगामी राजनीतिक चुनौतियों के लिए मजबूत संगठन और एकजुट नेतृत्व की जरूरत है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि कांग्रेस समय रहते अंदरूनी मतभेदों को नियंत्रित कर लेती है तो नए राजनीतिक समीकरणों का लाभ उठा सकती है, लेकिन यदि गुटबाजी बढ़ती है तो इसका असर पार्टी की चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है।





