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वारिस पंजाब दे के सामने वैचारिक और चुनावी चुनौती

Kiran
2 Nov 2026 11:49 AM IST
वारिस पंजाब दे के सामने वैचारिक और चुनावी चुनौती
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'अकाली दल वारिस पंजाब दे' (AD-WPD) में आंतरिक कलह बढ़ गई है। संगठन के ढांचे को भंग करने और मुख्य ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों को निलंबित करने के फैसले ने 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले इस नए राजनीतिक दल के भीतर मौजूद संगठनात्मक और वैचारिक मतभेदों को उजागर कर दिया है। इस राजनीतिक समूह की शुरुआत काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है। जनवरी 2025 में भारत निर्वाचन आयोग के पास पंजीकरण के लिए दी गई इनकी अर्जी अभी भी लंबित है, जिसके चलते इन्हें अपने प्रस्तावित नाम से पंजीकरण कराने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा है।
चुनावों की तैयारी कर रही इस पार्टी के सामने एक बड़ी बाधा यह भी है कि उनके पास कोई मान्यता प्राप्त चुनाव चिह्न नहीं है। इसके अलावा, नेतृत्व द्वारा सभी जिला अध्यक्षों को हटाए जाने के फैसले ने संकट को और गहरा कर दिया है। इस कदम का पार्टी की पांच सदस्यीय मुख्य ड्राफ्टिंग कमेटी ने कड़ा विरोध किया है।
20 अक्टूबर को कार्यकारी अध्यक्ष तरसेम सिंह को सौंपे गए छह पन्नों के पत्र में, कमेटी ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। इनमें एक उच्च पदस्थ सरकारी कर्मचारी द्वारा पार्टी की नियुक्तियों में कथित हस्तक्षेप, पदाधिकारियों को नई इनोवा गाड़ियां उपलब्ध कराने, और कुछ लोगों के सरकार तथा खुफिया एजेंसियों के साथ कथित संबंधों जैसे मुद्दे शामिल हैं। हालांकि, एक नया मोड़ तब आया जब पार्टी नेतृत्व ने कमेटी के सभी सदस्यों को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाते हुए उनकी प्राथमिक सदस्यता और अन्य जिम्मेदारियों से निलंबित कर दिया। कमेटी के सदस्य अभी भी अपने रुख पर अड़े हैं और उन्होंने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया है।
इस पार्टी की जड़ें 'वारिस पंजाब दे' आंदोलन में हैं, जिसकी शुरुआत सितंबर 2021 में हुई थी। इसका उद्देश्य अभिनेता और कार्यकर्ता संदीप सिंह, जिन्हें 'दीप सिद्धू' के नाम से जाना जाता है, के नेतृत्व में सिखों में राजनीतिक चेतना को फिर से जगाना था। खदूर साहिब के सांसद अमृतपाल सिंह के नेतृत्व में, यह संगठन अब चुनावी राजनीति में उतर चुका है। 2024 के लोकसभा चुनावों में खदूर साहिब से अमृतपाल की जीत ने इस संगठन को एक बड़ा बढ़ावा दिया। इसके बाद, उनके पिता तरसेम सिंह ने जनवरी 2025 में श्री मुक्तसर साहिब में 'माघी मेले' के दौरान 'अकाली दल (वारिस पंजाब दे)' की शुरुआत की। उन्होंने खुद को पारंपरिक पंथिक पार्टी, 'शिरोमणि अकाली दल' (SAD) के एक विकल्प के रूप में पेश किया है। सूत्रों का कहना है कि मौजूदा मतभेदों की जड़ एक उभरता हुआ वैचारिक विभाजन है। जहाँ नेतृत्व का एक धड़ा अपनी चुनावी अपील बढ़ाने के लिए अपेक्षाकृत उदार और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दृष्टिकोण का समर्थन करता है, वहीं पारंपरिक 'पंथिक' विचारधारा को मानने वाले लोग इस बदलाव से असहज हैं।
दक्का के विधायक मनप्रीत सिंह अयाली का उभार पार्टी की एक खास समस्या को दर्शाता है। मौजूदा विधायक होने के नाते वे एक अहम रणनीतिकार के रूप में उभरे हैं, जिनके पास विधायी अनुभव है और जो पारंपरिक अकाली राजनीतिक ढांचे को अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन पार्टी के भीतर कई लोग उनके बढ़ते प्रभाव से असहज हैं। पार्टी के एक नेता ने, अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा कि जब नेतृत्व ने 'जीतने की क्षमता' (winnability) के आधार पर उम्मीदवारों की पहचान करने के लिए एक सर्वे कराया, तो विरोध और तेज हो गया। नेतृत्व ने 'साफ-सुथरी सार्वजनिक छवि' और नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में कोई संलिप्तता न होने को भी मुख्य मानदंड बताया है। चुनाव आयोग की 'राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं' के कारण भी नेताओं को कट्टर या आक्रामक भाषण देने से बचने के लिए मजबूर होना पड़ा है। हालाँकि इससे पार्टी को अपना जनाधार बढ़ाने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे फिर वही सवाल उठता है कि क्या पार्टी की मूल वैचारिक प्रतिबद्धताएँ कमजोर हो रही हैं?
बहरहाल, AD-WPD के उभार ने SAD (शिरोमणि अकाली दल) के भीतर काफी बेचैनी पैदा कर दी है, जिसे अपने 'पंथिक' वोट बैंक के खिसकने का डर है। SAD अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने बार-बार इस नए संगठन को 'वायरस पंजाब दे' कहकर निशाना साधा है और आरोप लगाया है कि इसे आम आदमी पार्टी (AAP) का समर्थन हासिल है। इस बीच, तरसेम सिंह नाराज 'पंथिक' गुटों और उन मतदाताओं के बीच समर्थन जुटाने में लगे हैं, जिन्होंने या तो SAD छोड़ दिया है या जो अब राजनीतिक रूप से निष्क्रिय हो गए हैं। उन्होंने दलित मतदाताओं पर भी विशेष ध्यान दिया है। लेकिन स्थापित राजनीतिक ताकतों के खिलाफ AD-WPD कितनी मजबूती से लड़ पाएगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से अपने आंतरिक मामलों को व्यवस्थित कर पाती है। और चूँकि अमृतपाल अभी भी जेल में हैं, इसलिए संगठन की अधिकांश जिम्मेदारी तरसेम सिंह और अयाली को ही उठानी पड़ेगी।
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